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क्या ला ला लैंड लाल हो जाएगी? NYC के बाद अब लॉस एंजिल्स पर भारतीय मूल के सोशलिस्ट की नजर

Published: Mon, 02 Nov 2026 12:25 AM (IST)

लॉस एंजिल्स के मेयर चुनाव में भारतीय मूल की सोशलिस्ट नित्या रमन मौजूदा मेयर कैरेन बास को कड़ी चुनौती दे ...और पढ़ें

लॉस एंजिल्स के चुनाव में भारतीय मूल की नित्या रमन दे रहीं जबरदस्त टक्कर। (फाइल फोटो।)

लॉस एंजिल्स के चुनाव में भारतीय मूल की नित्या रमन दे रहीं जबरदस्त टक्कर। (फाइल फोटो।)

डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। अमेरिका में 2026 के मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म इलेक्शन) में हाउस, सीनेट और गवर्नरों के पदों पर नियंत्रण को लेकर काफी चर्चा हो रही है। इसी बीच कैलिफोर्निया में हो रहा एक स्थानीय चुनाव, जिसका भारत के साथ गहरा राजनीतिक और चुनावी जुड़ाव है, गोल्डन स्टेट (कैलिफोर्निया) और पूरे अमेरिका की पूंजीवाद के गढ़ वाली छवि को चुनौती दे रहा है।

लॉस एंजिल्स के मेयर चुनाव में (जिसका 15 अरब डॉलर का बजट कोस्टा रिका या छत्तीसगढ़ के बजट के बराबर है) मौजूदा मेयर 73 वर्षीय कैरेन बास का मुकाबला 45 वर्षीय नित्या रमन से है। भारत में जन्मीं नित्या रमन एक सोशलिस्ट काउंसिलवुमन हैं और उनकी चुनौती इस चुनावी मौसम के सबसे दिलचस्प राजनीतिक मुकाबलों में से एक बन गई है।

बराबरी का मुकाबला

चुनाव सर्वेक्षणों के अनुसार, मुकाबला अभी बराबरी का है। डेमोक्रेट उम्मीदवार बास जिन्हें कैलिफोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसम, कमला हैरिस और नैन्सी पेलोसी जैसे बड़े नेताओं का समर्थन हासिल है,उन्होंने ने सितंबर में 10 अंकों के अंतर से पीछे रहने के बाद अब वापसी की है।

अगर रमन 3 नवंबर को जीत जाती हैं तो लॉस एंजिल्स भी न्यूयॉर्क शहर की तरह हो जाएगा जहां जोहरान ममदानी सक्रिय हैं और यहां भी भारतीय मूल के एक ऐसे मेयर होंगे जो डेमोक्रेटिक सोशलिज्म (लोकतांत्रिक समाजवाद) से जुड़े हैं।

यह एक अजीब विडंबना होगी कि अमेरिका के दो सबसे आर्थिक रूप से शक्तिशाली, वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली और बेहद महंगे शहरों की कमान ऐसे राजनेताओं के हाथों में हो, जो एक ऐसे आंदोलन से जुड़े हैं जिसे ट्रंप और उनके राजनीतिक सहयोगी अक्सर अमेरिकी पूंजीवाद के लिए एक बड़ा खतरा बताते हैं।

कौन हैं नित्या रमन?

रमन की कहानी एक आम भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी जैसी है। केरल में जन्मीं रमन छह साल की उम्र में अमेरिका चली गईं। उनका बचपन लुइसियाना और मैसाचुसेट्स में बीता। हार्वर्ड और एमआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह एक सफल अर्बन प्लानर (शहरी योजनाकार) बनीं।

वह 2009 में भारत लौट आईं और ट्रांसपेरेंट चेन्नई नाम की एक शहरी शोध और वकालत पहल (अर्बन रिसर्च एंड एडवोकेसी इनिशिएटिव) की शुरुआत की। उन्होंने शहर में साफ-सफाई और पानी की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर काम किया।

2013 में लॉस एंजिल्स लौटने के बाद वह स्थानीय स्तर पर सक्रिय हो गईं, खासकर बेघर लोगों और किफायती आवास से जुड़े मुद्दों पर। उनकी शादी हॉलीवुड टीवी स्क्रीनराइटर वली चंद्रशेखरन से हुई है, जिन्होंने 30 रॉक और मॉडर्न फैमिली जैसे हिट सिटकॉम के लिए एपिसोड लिखे हैं।

2020 में रमन ने एक मौजूदा पार्षद को हराकर एलए सिटी काउंसिल के लिए चुनी जाने वाली पहली भारतीय बनीं। उन्होंने किफायती आवास, किरायेदारों की सुरक्षा और जलवायु नीति जैसे मुद्दों पर सक्रियता के लिए अपनी पहचान बनाई और खुद को एक डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट के रूप में पेश किया।

उनका मेयर पद का अभियान एक सीधी-सी बात पर केंद्रित है: लॉस एंजिल्स एक बेहद अमीर शहर है, लेकिन अपने निवासियों को बुनियादी सुविधाएं देने के मामले में यह बहुत खराब है।

उन्होंने अधिक किफायती आवास, बेहतर सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और बेघर लोगों के लिए एक अधिक जवाबदेह कार्यक्रम का वादा किया है। वह अपने काउंसिल जिले में सड़कों पर रहने वाले बेघर लोगों की संख्या में लगभग 50% की कमी का हवाला देती हैं, जबकि पूरे शहर में यह संख्या बढ़ी है। यह बास पर एक कटाक्ष है, जिनके कार्यकाल में सिटी ऑफ एंजल्स में बढ़ती जीवन-लागत, बुनियादी ढांचे की समस्याएं और बेघर लोगों की लगातार बनी हुई समस्या देखने को मिली है।

अमेरिका में फैला समाजवाद

दिलचस्प बात यह है कि लॉस एंजिल्स और इसी तरह कैलिफोर्निया और अमेरिका का समाजवाद की ओर झुकाव रहा है और इससे जुड़ा एक दिलचस्प भारतीय ऐतिहासिक पहलू भी है। ममदानी और रमन के अमेरिकी नगरपालिका की राजनीति में अपनी पहचान बनाने से बहुत पहले ही कई प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों और बुद्धिजीवियों का वहां की क्रांतिकारी राजनीतिक परंपराओं से सीधा सामना हो चुका था।

लाला लाजपत राय ने 1914 से 1919 के बीच अमेरिका में पांच साल बिताए। इस दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क में इंडिया होम रूल लीग की स्थापना की और यंग इंडिया नामक पत्रिका का प्रकाशन किया।

कट्टर मानवतावादी एम.एन. रॉय 1916 में एक वैश्विक यात्री के रूप में अमेरिका पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात अमेरिकी कट्टरपंथियों से हुई और उन्होंने समाजवाद का अध्ययन करना शुरू किया। बाद में वे मेक्सिको सिटी चले गए, जहां उन्होंने 1919 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ मेक्सिको की स्थापना की। इसके बाद, 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना में उन्होंने एक अहम भूमिका निभाई।

इसी दौरान, बी.आर. अंबेडकर ने न्यूयॉर्क शहर की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। वहां वे अमेरिका के कई प्रमुख उदारवादी और प्रगतिशील विचारकों के संपर्क में आए, जिनमें दार्शनिक जॉन डेवी भी शामिल थे।

वहीं, जयप्रकाश नारायण ने अमेरिका में सात साल (1922-1929) बिताए। उन्होंने बर्कले, आयोवा और विस्कॉन्सिन में पढ़ाई की, जहां वे मार्क्सवाद के संपर्क में आए और एक पक्के समाजवादी बनकर भारत लौटे। यह वह दौर था जब समाजवाद को चुनावों में काफी लोकप्रियता मिल रही थी।

1912 में सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार यूजीन डेब्स को लगभग 10 लाख (एक मिलियन) वोट मिले, जो उस समय कुल राष्ट्रीय वोटों का लगभग 6% था। समाजवादियों के पास सैकड़ों नगरपालिका पद थे, जिनमें मेयर के पद भी शामिल थे।

असल में 1950 के दशक की शुरुआत में ब्रुकलिन में नस्लीय अलगाव और आवास के मामले में भेदभाव को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के पिता फ्रेड ट्रंप का लोक गायक वुडी गुथरी से टकराव हुआ था। गुथरी एक पक्के समाजवादी थे। इस टकराव के चलते उन्होंने एक गाना लिखा जो एक शोषणकारी मकान मालिक पर तीखा प्रहार था और इसका शीर्षक था ओल्ड मैन ट्रंप। इस गाने में कहा गया कि ट्रंप ने इंसानी दिलों के खूनी खेल में नस्लीय नफरत को भड़काया।

इसके बाद आए रेड स्केयर (साम्यवाद के डर) और समाजवाद को साम्यवाद से जोड़ दिए जाने के कारण यह आंदोलन हाशिए पर चला गया था, लेकिन लगभग एक सदी बाद अब समय बदल रहा है। जाहिर है, ममदानी और रमन एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं और लोकतांत्रिक समाजवाद के एक अधिक आधुनिक रूप को पेश करते हैं।

समाजवाद के खिलाफ लड़ाई को अपनी राजनीतिक पहचान का मुख्य हिस्सा बनाने वाले ट्रंप के लिए न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स जैसे शहरों का ऐसे दो राजनेताओं द्वारा शासित होना जो कि विदेशी मूल के भी हैं काफी खटकने वाली बात हो सकती है।

इस बीच, भारत के लिए एक बहुत ही दिलचस्प विडंबना यह हो सकती है कि अमेरिका के दो सबसे प्रभावशाली शहरों की कमान भारतीय मूल के उन कार्यकर्ताओं के हाथों में हो, जो एक ऐसी राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका सामना भारत के कुछ महान विचारकों ने पहली बार अमेरिकी धरती पर ही किया था।

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