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द न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन। मंगल ग्रह की चट्टानों के नीचे अब भी सूक्ष्मजीवों का संसार मौजूद हो सकता है। लाल ग्रह के वायुमंडल में समय-समय पर मीथेन गैस की मौजूदगी के प्रमाणों के आधार पर वैज्ञानिकों ने यह उम्मीद जताई है। यह उम्मीद इस कारण जताई गई है, क्योंकि कई सूक्ष्मजीव भी मीथेन गैस के बनने में सहायक होते हैं।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी के मार्स एक्सप्रेस ऑर्बिटर मिशन ने 2013 की गर्मियों के दौरान मंगल की भूमध्य रेखा के समीप स्थित गेल क्रेटर (गड्ढा) के आसपास मीथेन गैस की पहचान की थी। 2011 से उस क्रेटर के इर्द-गिर्द खोज कर रहे अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के क्यूोरोसिटी रोवर ने भी उस दौरान मीथेन की मात्रा बढ़ने की जानकारी दी थी। मंगल पर मीथेन गैस की मौजूदगी की पुष्टि से कई रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। अभी तक वहां मीथेन बनने की सटीक प्रक्रिया का पता नहीं चल सका है। वैज्ञानिक यदि पहेली को सुलझा लेते हैं तो ग्रह पर जीवन की संभावना का पता चल जाएगा।

दो तरह से बनती है मीथेन :

मीथेन गैस का निर्माण केवल दो ही प्रक्रिया से होता है। पहली प्रक्रिया भूगर्भीय है जिसमें गर्मी और पानी की भूमिका होती है। दूसरी प्रक्रिया सूक्ष्मजीवों से संबंधित है। कुछ मीथोनोजेन सूक्ष्मजीव अपशिष्ट के रूप में मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मंगल ग्रह पर इनमें से किसी भी प्रक्रिया से मीथेन बनती है तो वहां जीवन की संभावना का आसानी से पता लग सकता है।

हाल ही में हुआ होगा निर्माण: 

मीथेन गैस बहुत जल्दी नष्ट हो जाती है। खगोलविदों के अनुसार सूर्य के प्रकाश और मंगल ग्रह के वायुमंडल में होने वाली रासायनिक क्रिया के चलते वहां बनी मीथेन को कुछ सौ साल में ही नष्ट हो जाना चाहिए। इसका अर्थ है कि हाल में वहां जिस मीथेन गैस के प्रमाण मिले हैं वह बहुत प्राचीन नहीं है, बल्कि कुछ सदी पहले ही उसका निर्माण हुआ होगा।

डेढ़ दशक पहले भी मिली थी मीथेन:

डेढ़ दशक पहले भी तीन वैज्ञानिकों ने मंगल पर मीथेन की मौजूदगी का दावा किया था, लेकिन उनकी खोज के दो साल बाद किए गए अध्ययन में मीथेन का प्रमाण नहीं मिल पाया था। यदि उन वैज्ञानिकों का दावा सही था तो इससे स्पष्ट है कि मंगल पर ना सिर्फ मीथेन बन रही है, बल्कि किसी प्रक्रिया के कारण तुरंत नष्ट भी हो रही है।

 

Posted By: Dhyanendra Singh

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