लास एंजिलिस, पीटीआइ। बाढ़, सूखा, तूफान, भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए लगातार बदलती जलवायु जिम्मेदार है। यह जलवायु संकट अब अल नीनो का कारण भी बन रहा है और ये साल-दर-साल और शक्तिशाली होते जा रहे हैं। एक नए अध्ययन में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है। यह अध्‍ययन पीएनएएस नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने चिंता जताते हुए कहा, ‘यदि जलवायु परिवर्तन की बढ़ती दर पर काबू नहीं पाया गया तो भविष्य में पश्चिमी प्रशांत महासागर में और चरम मौसमी आपदाएं देखने को मिल सकती हैं।’

अल नीनो बन रहा खतरा

अध्‍ययन में बताया गया है कि अल नीनो के कारण मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह का पानी सामान्य से काफी गर्म हो जाता है, जिसके कारण पश्चिमी प्रशांत से अमेरिका की ओर गर्म हवाएं चलनी शुरू हो जाती हैं। साथ ही यह वैश्विक मौसम को भी प्रभावित कर रहा है। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं में अमेरिका की हवाई यूनिवर्सिटी के शोधार्थी भी शामिल थे।

1901 से 2017 के बीच की आपदाओं का किया अध्ययन

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं की टीम ने वर्ष 1901 से लेकर 2017 तक 33 अल नीनो की घटनाओं के विवरणों की जांच की। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि लगातार बढ़ती गर्मी के कारण पश्चिमी प्रशांत महासागर में सतह का तापमान बढ़ रहा है। साथ ही, मध्य प्रशांत में तेज हवाओं के चलने से चरम अल नीनो की आवृत्ति में और वृद्धि हुई है।

पांच बार आ चुकी है मौसमी आपदा

शोधकर्ताओं ने पाया कि पूर्वी प्रशांत में होने वाली सभी अल नीनो घटनाएं 1970 के दशक से पहले हुई थीं, जबकि पश्चिमी-मध्य प्रशांत में एक दशक के बाद ऐसी घटना देखी गई थी। उन्होंने यह भी पाया कि 1970 के बाद के इतिहास में पांच बार चरम अल नीनो घटनाएं हुई हैं।

बढ़ेंगी समस्याएं

हवाई यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता और इस अध्ययन के सह-लेखक बिन वांग ने कहा, ‘कंप्यूटर सिमुलेशन से पता चलता है कि यदि भविष्य में भी जलवायु परिवर्तन इसी प्रकार जारी रहा तो चरम अल नीनो की आवृत्ति तो बढ़ेगी ही, साथ ही कई तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी उत्पन्न होनी शुरू हो जाएंगी।’

पहले पड़ चुका है अकाल

अध्ययन के मुताबिक, वर्षों पहले चरम अल नीनो के कारण पश्चिमी प्रशांत द्वीप समूह और ऑस्ट्रेलिया में गंभीर सूखे पड़ गया था , जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी। वहीं, दूसरी और अत्यधिक बारिश ने दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तटों को काफी नुकसान पहुंचाया था। इससे समुद्र में मछलियों के साथ -साथ प्रवाल भित्तियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था। शोधकर्ताओं का दावा है कि इस अध्ययन के परिणामों से वैश्विक स्तर पर मौसम का बेहतर पूर्वानुमान लगाने में मदद मिल सकती है। 

Posted By: Krishna Bihari Singh

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