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बंगाल का रण: बदली डेमोग्राफी-बढ़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा... हिंसा की आग से निपटने के लिए चुनाव आयोग कितना तैयार?

By Vishal ShreshthaEdited By: Garima Singh
Published: Tue, 17 Mar 2026 07:06 PM (IST)Updated: Tue, 17 Mar 2026 08:47 PM (IST)

बंगाल में चुनाव हमेशा से हिंसा के लिए कुख्यात रहे हैं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। बदली डेमोग्राफी, राजनीतिक ...और पढ़ें

HighLights

  1. बंगाल में चुनावी हिंसा एक पुरानी और गंभीर समस्या

  2. बदली डेमोग्राफी, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने हिंसा बढ़ाई

  3. निष्पक्ष चुनाव कराना आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती

विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। पंचायत, नगर निकाय से लेकर विधानसभा व लोकसभा तक, बंगाल में होने वाले प्रत्येक चुनाव खून-खराबे के लिए कुख्यात हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के सैकड़ों नेता-कार्यकर्ता इसकी बलि चढ़ चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य की बदली डेमोग्राफी, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस व मुख्य विपक्षी भाजपा के बीच बढ़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा व सियासी धुव्रीकरण ने यहां के चुनावी माहौल को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है।

राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं की हत्या व अपहरण, पोलिंग एजेंटों की पिटाई, बमबाजी, गोलीबारी, बूथों में तोडफोड़, वोटों की लूट, प्रत्याशियों व उनके परिवार के सदस्यों को धमकियां, ये सब बंगाल के चुनावों में आम बातें हो चुकी हैं। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच बंगाल में अबाध व शांतिपूर्ण तरीके से निष्पक्ष चुनाव कराना आयोग व प्रशासन के लिए सबसे कठिन चुनौती हैं।

मालदा व मुर्शिदाबाद जिले तो इतने संवेदनशील हैं कि वहां के आम लोग चुनाव आते ही सिहर उठते हैं। हर बार कड़ी सुरक्षा व्यवस्था करके भी चुनावी हिंसा पर काबू नहीं पाया जा सका है। इस बार विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले राज्य के विभिन्न जिलों में जिस तरह बड़े परिमाण में हथियारों व बमों की बरामदगी हुई है, वह और चिंता पैदा कर रही है।

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बंगाल में 'पालिटिकल लीगेसी' बन चुकी है हिंसा

बांग्ला में एक मशहूर कहावत है-'जोर जार, मुलुक तार।' इसका अर्थ है-'जिसके पास ताकत, देश उसी का।' बंगाल की राजनीति में यह अंतिम सत्य बन चुका है। सत्ता पर आसीन होने के बाद हरेक पार्टी इसी का अनुसरण करती आई है। कांग्रेस के जमाने से शुरू हुआ यह सिलसिला वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासन से लेकर तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों की सत्ता तक बदस्तूर जारी है।

विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में एक पार्टी का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना राजनीतिक हिंसा बढऩे का प्रमुख कारण रहा है। सत्ता की अभ्यस्त हो जाने के बाद पार्टी इसपर काबिज रहने को कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती। दूसरी तरफ विरोधी दल भी पूरा जोर लगाते हैं। यही जबर्दस्त टकराव को जन्म देती है, जो राजनीतिक हिंसा का रूप धारण करती हैं।

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बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौर पूरे साल ही जारी रहता है, लेकिन चुनाव आते ही यह बेहद उग्र रूप धारण कर लेता है क्योंकि उस समय वर्चस्व की लड़ाई चरम पर पहुंच जाती है। सभी दलों के नेता-कार्यकर्ता इसे 'निर्णायक लड़ाई की तरह देखने लगते हैं।

पंचायत चुनावों में होती है सबसे अधिक हिंसा

यूं तो बंगाल में होने वाला कोई भी चुनाव हिंसा से अछूता नहीं है, लेकिन सबसे अधिक हिंसा पंचायत चुनावों के दौरान देखने को मिलती है। कारण, बंगाल गांवों में बसता है। राज्य की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत आता है इसलिए वहां वर्चस्व की लड़ाई सबसे अधिक है। 2023 के पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा में 45 से अधिक लोगों की मौतें हुई थीं।

2018 के पंचायत चुनाव में यह आंकड़ा 23 था। वहीं 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान हिंसा में करीब 40 लोग मारे गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान 11 लोगों की मौतें हुई थीं। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान दो लोगों की जानें गई थीं।

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बंगाल इकलौता राज्य नहीं है, जहां चुनावी हिंसा होती हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार में चुनावों से पहले बाहुबलियों की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। गुजरात व केरल भी एक समय चुनावी हिंसा की चपेट में रहे हैं, हालांकि उन राज्यों में इसे समय के साथ काफी हद तक नियंत्रित किया जा सका है।

केंद्रीय बलों की दो से ढाई हजार कंपनियों की सुरक्षा में मतदान

राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बंगाल में केंद्रीय बलों की दो से ढाई हजार कंपनियों की सुरक्षा में मतदान कराए जाएंगे। केंद्रीय बलों के प्रबंधन के लिए सीईओ कार्यालय में एकीकृत नियंत्रण कक्ष खोला जाएगा।

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इसी तरह जिला चुनाव अधिकारियों के कार्यालयों में भी नियंत्रण कक्ष खोले जाएंगे। इससे केंद्रीय बलों का प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि विरोधी दल बंगाल में मतदान के दौरान राज्य प्रशासन द्वारा केंद्रीय बलों के मूवमेंट को शिथिल कर दिए जाने के आरोप लगाते आए हैं। बंगाल में इस समय केंद्रीय बलों की 480 कंपनियां मौजूद हैं।

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