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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की दोहरी चुनौती: TMC-BJP के खिलाफ मल्लिकार्जुन खरगे का प्लान

Published: Wed, 08 Apr 2026 10:54 PM (IST)

पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस को राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। उसे एक ओर ...और पढ़ें

कांग्रेस का प्लान (फोटो-पीटीआई)

कांग्रेस का प्लान (फोटो-पीटीआई)

HighLights

  1. कांग्रेस को बंगाल में राज्य-राष्ट्रीय राजनीति में संतुलन साधना।

  2. TMC के खिलाफ आक्रामक, INDIA गठबंधन की एकता भी जरूरी।

  3. मल्लिकार्जुन खरगे ने भ्रष्टाचार, विकास पर TMC को घेरा।

संजय मिश्र, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन साधना किसी चुनौती से कम नहीं है।

लंबे अर्से बाद बंगाल के सियासी अखाड़े में अकेले अपने दम पर चुनावी ताल ठोक रही कांग्रेस के सामने एक ओर अपने अस्तित्व और प्रतिष्ठा बचाने के लिए राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ आक्रामक रूख अपनाने की जरूरत है।

दूसरी तरफ भाजपा की आक्रामक ब्रांड राजनीति को थामने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी आइएनडीआइए गठबंधन की एकता को बनाए रखना भी कांग्रेस के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है।

इस दोहरी चुनौती के मद्देनजर बंगाल में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के प्रचार अभियान के तेवर और कलेवर पर दिलचस्प निगाहें लगी है।

कांग्रेस हासिल करेगी खोई हुई राजनीतिक साख

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कोलकाता में मंगलवार को बंगाल के लिए पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए बेशक तृणमूल सरकार के 15 साल के शासन में भ्रष्टाचार बढ़ने तथा सूबे का विकास नहीं होने की बातें बेशक उठाईं, मगर उनके सियासी हमलों के तेवर भाजपा पर ज्यादा तीखे दिखे।

हालांकि बंगाल के चुनाव अभियान में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अभी उतरा नहीं है मगर केरल, असम तथा पुडुचेरी का चुनाव खत्म होने के बाद अब तमिलनाडु और बंगाल में पार्टी के चुनाव अभियान में ही उतरेगा।

कांग्रेस के सामने बंगाल में सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करना है। चुनाव के दरम्यान संगठन मजबूत करने का उसके पास विकल्प नहीं और जाहिर तौर पर सूबे की जनता का भरोसा हासिल करके ही पार्टी अपनी स्थिति सुधार सकती है।

ऐसे में चुनाव लड़ते हुए कांग्रेस के लिए यह जरूरी होगा कि वह ममता सरकार के खिलाफ मजबूत और आक्रामक अभियान चलाते हुए नजर आए।

भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और कथित घोटालों जैसे मुद्दों पर लोगों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करे। मगर इस आक्रामकता में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी अचड़न राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को कायम रखने की है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस संसद में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा जैसे मुद्दे पर उसके साथ रही है।

बंगाल चुनाव से ठीक पहले 16-18 अप्रैल को महिला आरक्षण संशोधन बिल के लिए होने वाले संसद सत्र में भी कांग्रेस और टीएमसी को विपक्षी एकता के लिए साथ आना पड़ेगा।

वर्तमान सियासत की जरूरत के मद्देनजर दोधारी तलवार पर चल रही कांग्रेस के लिए स्वाभाविक है कि वह ऐसी ऐसी रणनीति बनाए जिसमें बंगाल में अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा और हित को साधते हुए राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति पर भी आंच न आने दे।

पार्टी के लिए यह बहुत आसान नहीं है और शीर्ष नेतृत्व को ही ममता सरकार को लेकर अपने चुनावी अभियान की भाषा तथा नैरेटिव की दशा-दिशा निर्धारित करनी होगी।

इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए संभावना यही है कि कांग्रेस राज्य के नेताओं को स्थानीय मुद्दों पर हमलावर रहने तथा राष्ट्रीय नेतृत्व आलोचनाओं को संयम की परिधि से बाहर न जाने देने की रणनीति अपनाता दिखे।

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