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बंगाल में 7 दिन के भीतर फाइलों का करना होगा निपटारा, मुख्य सचिव का सख्त निर्देश

Published: Sun, 01 Nov 2026 06:43 PM (IST)

पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रशासनिक सुस्ती दूर करने के लिए सभी विभागों को सात कार्यदिवस के भीतर फाइलों का निपटारा करने का निर्देश दिया है।

बंगाल की प्रशासनिक कार्यसंस्कृति में बदलाव की उम्मीद (फाइल फोटो- मुख्य सचिव मनोज कुमार)

बंगाल की प्रशासनिक कार्यसंस्कृति में बदलाव की उम्मीद (फाइल फोटो- मुख्य सचिव मनोज कुमार)

HighLights

  1. मुख्य सचिव का 7 दिन में फाइल निपटारे का निर्देश।

  2. प्रशासनिक सुस्ती कम कर, समन्वय बढ़ाने का लक्ष्य।

  3. निवेश, रोजगार और आम लोगों को मिलेगा लाभ।

इंद्रजीत सिंह, कोलकाता । सरकारी दफ्तरों में किसी काम के लिए आवेदन करने के बाद फाइल का एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचना और फिर किसी दूसरे विभाग की मंजूरी के इंतजार में महीनों पड़े रहना आम अनुभव रहा है।

कई बार परियोजना तैयार होती है, बजट का प्रविधान भी रहता है, लेकिन किसी दूसरे विभाग से आवश्यक सहमति या टिप्पणी नहीं मिलने के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाता। बंगाल में अब इसी प्रशासनिक सुस्ती को दूर करने की कोशिश की गई है।

राज्य के मुख्य सचिव मनोज कुमार अग्रवाल ने पिछले दिनों सभी विभागों को दूसरे विभागों से प्राप्त पत्रों, प्रस्तावों और संदर्भों का सामान्यतः सात कार्यदिवस के भीतर निपटारा करने का निर्देश दिया है। इस आदेश का उद्देश्य सरकारी विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना और फैसले लेने की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना है।

यह पहल देखने में भले ही एक प्रशासनिक निर्देश लगे, लेकिन राज्य के विकास और आर्थिक गतिविधियों पर इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है। किसी उद्योग की स्थापना से लेकर बुनियादी ढांचे की परियोजना, जमीन के उपयोग, वित्तीय मंजूरी और विभिन्न सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक कई विभागों की भूमिका होती है।

ऐसे में एक विभाग की देरी दूसरे विभाग के काम को भी प्रभावित करती है। यदि नई व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होती है तो इस तरह की अड़चनों को कम करने में मदद मिल सकती है।

निवेश और रोजगार के रास्ते की बाधाएं हो सकती हैं कम

बंगाल में औद्योगिक निवेश आकर्षित करने और नई परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की चुनौती लंबे समय से चर्चा में रही है। निवेशक केवल जमीन, बिजली और श्रम उपलब्धता के आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि सरकारी मंजूरियों और प्रशासनिक प्रक्रिया में लगने वाला समय भी उनके लिए महत्वपूर्ण होता है।

किसी परियोजना के लिए उद्योग विभाग को वित्त विभाग की सहमति चाहिए, तो कहीं पर्यावरण, भूमि और स्थानीय प्रशासन से जुड़े विभागों की अनुमति आवश्यक होती है। इन विभागों के बीच पत्राचार में देरी होने पर परियोजना की शुरुआत भी टल सकती है। नई समयसीमा से ऐसी प्रक्रियाओं में तेजी आने की उम्मीद है।

खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है, जहां छोटी-छोटी प्रशासनिक अड़चनें भी उद्यमियों की लागत और समय दोनों बढ़ा देती हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का विकास, सड़क और परिवहन परियोजनाएं तथा बिजली-पानी से जुड़े प्रस्ताव भी इससे लाभान्वित हो सकते हैं।

हालांकि, सात दिन में विभागीय जवाब मिलना और सात दिन में पूरी परियोजना को मंजूरी मिल जाना दो अलग-अलग बातें हैं। इसका वास्तविक लाभ इस पर निर्भर करेगा कि संबंधित विभाग कितनी तत्परता से आगे की प्रक्रिया पूरी करते हैं।

आम लोगों तक भी पहुंच सकता है बदलाव का लाभ

इस व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आम नागरिकों से जुड़ा है। सरकारी योजनाओं का लाभ, विभिन्न प्रमाणपत्रों और सेवाओं से जुड़े प्रस्ताव तथा जिला प्रशासन और राज्य सचिवालय के बीच समन्वय की जरूरत वाले मामलों में विभागीय देरी का असर सीधे लोगों पर पड़ता है।

कई बार एक विभाग की सहमति नहीं मिलने से लाभार्थियों को इंतजार करना पड़ता है। यदि सरकारी स्तर पर जवाबदेही बढ़ती है तो ऐसी समस्याओं में कमी आ सकती है। मुख्य सचिव ने प्रत्येक विभाग को लंबित मामलों की निगरानी के लिए अलग व्यवस्था बनाने और विभागीय सचिवों को नियमित समीक्षा करने का निर्देश दिया है।

जिन मामलों का समाधान विभागीय स्तर पर नहीं हो सकेगा, उन्हें मुख्य सचिव के संज्ञान में लाना होगा। यानी अब केवल फाइल भेज देना पर्याप्त नहीं होगा, उसके निपटारे की निगरानी भी करनी होगी।

नया निर्देश विभागों की ओर से सहमति देने में होने वाली देरी पर केंद्रित

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल सचिवालय मैनुअल, 2019 में भी किसी मामले को निर्णय लेने वाले अधिकारी के समक्ष सामान्यतः सात दिनों के भीतर प्रस्तुत करने और एक सप्ताह से अधिक लंबित मामलों की साप्ताहिक समीक्षा का प्रविधान है।

नया निर्देश विशेष रूप से अलग-अलग विभागों के बीच पत्राचार और सहमति देने में होने वाली देरी पर केंद्रित है। दरअसल, प्रशासनिक सुधार की असली कसौटी आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उसका जमीन पर असर दिखना है।

सात कार्यदिवस की समयसीमा यदि केवल कागजों तक सीमित नहीं रहती और विभागों के बीच जवाबदेही की नियमित व्यवस्था बनती है तो इससे बंगाल में सरकारी कामकाज की पुरानी सुस्ती कम हो सकती है। इसका लाभ निवेशकों, उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुंचने के साथ राज्य की विकास परियोजनाओं को भी मिल सकता है।

 

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