विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। सबरीमाला मसले पर सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि इससे नारी जाति का न तो अपमान हो रहा है और न ही उत्पीड़न। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कमलेश सिंह ने सोमवार को 'दैनिक जागरण' के कार्यालय में 'क्या सुप्रीम कोर्ट को सबरीमाला पर अपना फैसला बदलना चाहिए?' विषय पर आयोजित परिचर्चा सत्र में ये विचार व्यक्त किए।

उन्होंने कहा-'सबरीमाला पर दो दिनों में फैसला आ गया जबकि राममंदिर का मसला सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लटका पड़ा है। मामलों पर द्रुत गति से सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन हो रहा है जबकि राम मंदिर पर सुनवाई शिथिल पड़ी हुई है। अगर ठीक से सुनवाई हो तो राममंदिर का मसला कुछ भी नहीं है। इसे निपटाने में वक्त नहीं लगेगा। अब तो मुसलमानों का एक वर्ग भी राम मंदिर के पक्ष में है।'

सिंह ने आगे कहा-'सबरीमाला से असंख्य हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई नहीं जा सकता लेकिन जब इतनी बड़ी संख्या में लोग इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं तो सुप्रीम कोर्ट को इसपर ध्यान देना चाहिए।'

सिंह ने कहा-'मेरा मानना है कि अदालतों को धर्म व आस्था से संबंधित किसी भी मामले पर कोई भी फैसला सुनाने से पहले इससे जुड़ी भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए। सदियों से चली आ रही परंपराओं व मान्यताओं को ठेस पहुंचाने का कोई औचित्य नहीं है।

हर मंदिर के अपने कुछ निर्दिष्ट नियम-कानून हैं, जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए। अदालतों को धार्मिक मान्यताओं का भी अध्ययन करना चाहिए। मासिक धर्म शुरू होने पर तो महिलाएं घर में भी पूजा-पाठ नहीं करतीं।'

सिंह ने कहा- हिंदू कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवनशैली है। कुछ लोगों को इस जीवनशैली से तकलीफ है। हिंदुओं को लेकर विभाजनकारी नीतियां अपनाई गईं, जिसके कारण वे विभिन्न धर्मों में बंटते चले गए। हिंदू जैसे सहिष्णु दुनिया में कहीं नहीं हैं।' 

Posted By: Preeti jha

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