कोलकाता, राज्य ब्यूरो। स्कूल सेवा आयोग(एसएससी) के ग्रुप-सी भर्ती में हुए घोटाले के मामले में राज्य सरकार ने अभी तक राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और पांच मौजूदा व पूर्व सरकारी अधिकारियों के नाम चार्जशीट में शामिल करने की अनुमति नहीं दी है। ऐसा सीबीआइ सूत्रों ने दावा किया है। सूत्रों के मुताबिक इस अनुमति के लिए पहले ही राज्य को पत्र भेजा गया था, जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।

चार्जशीट दाखिल करने के लिए राज्य की अनुमति की आवश्यकता

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के अनुसार किसी भी राज्य सरकार के कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए राज्य की अनुमति की आवश्यकता होती है। यह नियम तब भी लागू होता है, जब जांच शुरू होने के समय कोई व्यक्ति उस पर हो या चार्जशीट पेश करने के समय सेवानिवृत्त हो गए हों। जांचकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की इस धारा के आधार पर एसएससी ग्रुप सी भर्ती मामले में पार्थ सहित छह लोगों के नाम चार्जशीट में शामिल करने के लिए कुछ हफ्ते पहले ही राज्य की ममता सरकार को पत्र भेजा गया था। सीबीआइ सूत्रों का दावा है कि उनकी ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया है।

चार्जशीट में इनके नाम शामिल 

सीबीआइ ने शुक्रवार को ही ग्रुप-सी टीचिंग स्टाफ की नियुक्ति में भ्रष्टाचार के मामले में चार्जशीट दाखिल की है। इसमें पार्थ के अलावा 15 और लोगों के नाम हैं। इस चार्जशीट में मध्य शिक्षा परिषद के पूर्व सलाहकार शांतिप्रसाद सिन्हा, समरजीत आचार्य, सौमित्र सरकार, मध्य शिक्षा परिषद के पूर्व अध्यक्ष अशोक कुमार साहा, तदर्थ समिति के अध्यक्ष कल्याणमय गांगुली हैं। आरोपितों में अवैध रूप से नियुक्ति पाने वाले लोगों के भी नाम है जिसमें दीपांकर घोष, सुब्रत खां, अक्षय मनि, समरेश मंडल, सौम्य कांति मृद्या, अभिजीत दलुई, सुकांत मल्लिक, इदरीश अली मोल्ला, अजीत बर और फरीद हुसैन कास्कार शामिल हैं। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक पार्थ, शांतिप्रसाद, अशोक, कल्याणमय, सौमित्र और समरजीत के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए राज्य की अनुमति के लिए एक पत्र भेजा गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सीबीआइ द्वारा सौंपी गई चार्जशीट कोर्ट में स्वीकार होगा या नहीं?

वकीलों ने कहा 

कलकत्ता हाई कोर्ट के एक वकील ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ यदि राज्य सरकार अनुमति नहीं दे तब भी आरोप पत्र दायर किया जा सकता है, लेकिन ऐसे में संभावना है कि ट्रायल के समय दिक्कत हो सकती है। हालांकि एक अन्य वकील का कहना है कि यह मामला केस पर निर्भर करता है। चूंकि इस मामले में अवैध रूप से नियुक्ति का आरोप सीधे तौर पर साबित होता है, इसलिए इस मामले में किसी अनुमति की जरूरत नहीं है।

Edited By: Sumita Jaiswal

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