सितरंग से अर्णब तक: मानसून की विदाई के बाद बंगाल की खाड़ी क्यों बन रही चक्रवात का केंद्र?
बंगाल की खाड़ी में मानसून के बाद चक्रवातों का खतरा बढ़ रहा है, 'अर्णब' इसकी नवीनतम कड़ी है। 2022 से ...और पढ़ें

बंगाल की खाड़ी में मानसून बाद चक्रवातों का खतरा बढ़ा है

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। बंगाल की खाड़ी में मानसून बीतते ही चक्रवात का खतरा बढ़ता जा रहा है। ‘अर्णब ’ इसकी नवीनतम कड़ी है। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2022 से अब तक लगातार पांच साल अक्टूबर में बंगाल की खाड़ी से चक्रवात उठे हैं।
2022 में सितरंग, 2023 में हामून, 2024 में दाना, 2025 में मोंथा और अब अर्णब की उत्पत्ति हुई है। वहीं 1982-2026 के दौरान बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न होकर भारत-बांग्लादेश के तटीय इलाकों में पहुंचे 82 चक्रवातों में 63 मानसून बीतने के बाद यानी अक्टूबर-दिसंबर की अवधि में बने।
मौसम विज्ञानी गणेश कुमार दास बताते हैं कि बंगाल की खाड़ी में चक्रवात दो बार सक्रिय होते हैं-मानसून से पहले (मार्च से मई) और मानसून के बाद (अक्टूबर से दिसंबर)।
बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों का खतरा बढ़ा
चक्रवात के लिए समुद्र की सतह का गर्म होना, पर्याप्त नमी, पहले से मौजूद कम दबाव का क्षेत्र और ऊंचाई के साथ हवा की गति में बहुत अधिक अंतर नहीं होना जरूरी है।
सामान्य तौर पर समुद्र की सतह का तापमान कम से कम 26.5 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसके साथ गर्मी समुद्र की ऊपरी परत तक सीमित न रहकर पर्याप्त गहराई में मौजूद होनी चाहिए, ताकि चक्रवात को ऊर्जा मिलती रहे।
अक्टूबर में मानसून की विदाई के साथ वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आता है। कई बार ऊपरी और निचली हवाओं के बीच अंतर घटता है तथा समुद्र से मिलने वाली गर्मी और नमी कम दबाव वाले क्षेत्र को मजबूत होने का अवसर देती है।
बंगाल की खाड़ी का भौगोलिक स्वरूप भी महत्वपूर्ण
बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में समुद्र का आकार अपेक्षाकृत संकरा होता जाता है। यहां चक्रवात के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ने पर निचले तटीय इलाकों में बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ सकता है।
विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, उत्तर हिंद महासागर में अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनने की आवृत्ति अधिक रही है।
बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों को इसलिए विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है। अक्टूबर-दिसंबर के दौरान बनने वाले चक्रवातों का असर भारत-बांग्लादेश के साथ-साथ म्यांमार पर भी पड़ सकता है।
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