कोलकाता, राज्य ब्यूरो। जिस सिंगुर में 15 वर्ष पहले हुए आंदोलन की वजह से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं, अब वहीं से भाजपा ने भी किसानों के लिए आंदोलन शुरू किया है। 2006 में ममता ने कोलकाता से लेकर सिंगुर तक टाटा की नैनो कार परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ धरना और प्रदर्शन किया था। उस आंदोलन की वजह से टाटा को बंगाल के सिंगुर से गुजरात जाना पड़ा और 2011 में 34 वर्षो के वाम शासन का अंत हो गया। अब उसी सिंगुर की धरती पर भाजपा नेताओं ने किसानों से जुड़े मुद्दे को लेकर तीन दिवसीय धरना शुरू किया है।

भारतीय जनता किसान मोर्चा के बैनर तले मंगलवार से आंदोलन शुरू किया गया है, जो आगामी 16 दिसंबर तक चलेगा। मुख्य रूप से भाजपा कृषि ऋण माफी, खाद-बीज की कालाबाजारी बंद करने, पेट्रोल-डीजल पर वसूले जा रहे वैट घटाने, अनाजों के सही से नहीं मिल रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), कृषि कार्यो के बिजली बिल कम करने समेत सात सूत्रीय मुद्दों को हथियार बनाया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह धरना सिंगुर में टाटा फैक्ट्री जहां बननी थी उसकी तोड़ी गई दीवार से ठीक बाहर दिया जा रहा है।

सिंगुर के किसान कह रहे हैं कि इस धरने से एक बार फिर 15 वर्ष पहले हुए आंदोलन की याद ताजी हो गई है। इस दिन बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिलीप घोष, विधानसभा में विरोधी दल के नेता सुवेंदु अधिकारी समेत राज्य इकाई के सभी प्रमुख नेता सिंगुर पहुंचे। जुलूस निकाला गया और फिर धरना शुरू हुआ। सुवेंदु ने बंगाल में किसानों की स्थिति को लेकर ममता सरकार पर जमकर हमला बोला और किसानों की मांगों को लेकर उदासीन रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए राज्य सचिवालय (नवान्न) मार्च करने की भी घोषणा की।

भाजपा नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती की, लेकिन ममता ने कमी नहीं की। यहां के किसानों को सबसे ज्यादा बिजली के दाम चुकाने पड़ते हैं। दूसरे राज्यों के लिए अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यहां से लोगों को किराए पर लेकर दूसरे राज्यों में ले जाया जा रहा है। अब देखने वाली बात होगी कि जिस सिंगुर में भाजपा के इस आंदोलन का असर क्या होता है? ममता ने आंदोलन किया तो वहां कारखाना नहीं लगा जिसका मलाल आज भी किसानों को है। अब उन्हीं किसानों के लिए भाजपा का धरना प्रदर्शन क्या असर दिखाएगा, यह तो वक्त बताएगा। आज भी वहां के किसान जमीन मिलने के बाद भी खुश नही हैं। क्योंकि उक्त जमीन पर ठीक से खेती भी नहीं हो पा रही है।

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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