बंगाल में 51 लाख मतदाता घटे, फिर भी पड़े 30 लाख ज्यादा वोट; नतीजों पर दिखेगा असर?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 51 लाख कम मतदाता होने के बावजूद 30 लाख से अधिक वोट पड़े, जिससे मतदान प्रतिशत 92.93% के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया।
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औसतन हर विधानसभा सीट पर करीब 10 हजार अधिक वोट पड़े (फाइल फोटो)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के बाद एक बेहद चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या पिछले चुनाव के मुकाबले करीब 51 लाख कम हो गई, लेकिन इसके बावजूद मतदान करने वालों की संख्या 30 लाख से अधिक बढ़ गई। इस असामान्य ट्रेंड ने राज्य में मतदान प्रतिशत को ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचा दिया है।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, दूसरे चरण के मतदान के बाद रात 12 बजे तक 92.63 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई। दोनों चरणों को मिलाकर यह आंकड़ा 92.93 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो न सिर्फ बंगाल बल्कि देश के सभी विधानसभा चुनावों में अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत माना जा रहा है।
वोटिंग से दूर रहने वाले मतदाता भी मतदान केंद्र पहुंचे
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुंचे, जो आमतौर पर वोट नहीं डालते थे या किसी कारणवश मतदान से दूर रहते थे। यही अतिरिक्त वोट इस चुनाव के परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक, बढ़े हुए 30 लाख वोटरों में से करीब 21 लाख सिर्फ पहले चरण में ही वोट डालने पहुंचे।विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर देखें तो औसतन हर सीट पर करीब 10 हजार अधिक वोट पड़े हैं। पहले चरण की सीटों में यह बढ़ोतरी औसतन 14,237 वोट प्रति सीट रही, जबकि दूसरे चरण में यह आंकड़ा 6,615 रहा।
अतिरिक्त वोटर ही चुनावी नतीजों की दिशा कर सकते हैं तय
अब सवाल यह है कि यह भारी मतदान किसके पक्ष में जाएगा। विभिन्न एक्जिट पोल में कहीं भाजपा को बढ़त दिखाई गई है, तो कहीं तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में बने रहने की संभावना जताई गई है। हालांकि लगभग सभी सर्वेक्षणों में कड़ी टक्कर के संकेत साफ हैं। चुनावी इतिहास बताता है कि कई बार एक्जिट पोल गलत भी साबित होते हैं।
सामान्य धारणा यह है कि अधिक मतदान अक्सर सत्ता विरोधी लहर का संकेत होता है, लेकिन इसके उलट उदाहरण भी मौजूद हैं। तृणमूल कांग्रेस के नेता पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए दावा कर रहे हैं कि अधिक मतदान के बावजूद तब जनता ने सत्ता पक्ष का समर्थन किया था।
विपक्ष दे रहा 2011 का उदाहरण
वहीं विपक्ष 2011 के चुनाव का उदाहरण दे रहा है, जब 84.33 प्रतिशत मतदान के साथ 34 साल पुराने वाम शासन का अंत हुआ था। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि रिकार्ड मतदान का यह रुझान किस पार्टी के पक्ष में जाता है। स्पष्ट है कि इस बार के अतिरिक्त वोटर ही चुनावी नतीजों की दिशा तय कर सकते हैं।
