कोलकाता, राज्य ब्यूरो। किसानों के नाम पर राजनीतिक पार्टियां वैसे तो दशकों से राजनीति करती आ रही हैं। परंतु पिछले लगभग सवा साल से तो हर दिन किसानों को लेकर ही सियासत होती रही। क्या इस राजनीति से किसानों को भला हुआ? अगर भला हुआ होता तो बंगाल के बर्धमान में पिछले चार दिनों में तीन किसानों की असामयिक मौत नहीं हुई होती। केंद्र सरकार ने तीन नए कृषि कानून बनाए तो उसके खिलाफ कांग्रेस, तृणमूल, वामपंथी दल समेत कई और पार्टियों ने राजनीति शुरू कर दी और नतीजा यह रहा कि सरकार को तीनों ही कृषि कानून रद करने पड़े। क्या राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढूनी, योगेंद्र यादव जैसे एजेंडाधारी खुद को किसानों का सबसे बड़ा लंबरदार कहने वाले को खबर भी है कि बंगाल में तीन किसान की मौत हो गई है?

दरअसल इन एजेंडाधारियों को तो इस समय अपनी सियासी एजेंडा को आगे बढ़ाने से फुरसत कहां है। किसी को चुनाव लड़ना है तो किसी को राजनीतिक दलों के साथ समझौता कर टिकट पाना है। यह सब खुद को किसान नेता कहने वाले ऐसे तत्व हैं जिन्हें असली किसानों से कुछ लेना ही देना नहीं है। आज क्यों नहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा बंगाल आकर मृत किसानों के परिजन से मिल रही हैं। क्यों नहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेज रही हैं? ऐसे कई सवाल हैं जिसका जवाब किसानों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेताओं को देना ही होगा। मृत किसानों के स्वजनों का दावा है कि खेती में हुए नुकसान की वजह से उन्होंने खुदकुशी की है।

राज्य सरकार की ओर से उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला है। दूसरी ओर राज्य सरकार इसे स्वीकार नहीं रही है। कृषि मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय का दावा है कि राज्य में खेती में हुए नुकसान की वजह से किसी किसान ने जान नहीं दी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर मौत कैसे हुई? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या किसानों के स्वजन झूठ बोल रहे हैं?

कृषक सभा के राज्य सचिव अमल हलदर का दावा है कि तृणमूल सरकार के दौरान राज्य में 246 किसानों ने खुदकुशी की है। किसानों को उनकी फसल की कोई वाजिब कीमत नहीं मिलती है। प्राकृतिक आपदा के बाद भी किसानों को कोई सहायता नहीं मिली। खैर, जो भी हो मौत की सच्चाई सामने आनी चाहिए और अन्य किसी किसान की इस तरह मौत न हो इस पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

Edited By: Sanjay Pokhriyal