बंगाल: शुभेंदु सरकार को झटका, राष्ट्रपति ने 'गुंडा दमन विधेयक' पुनर्विचार के लिए लौटाया
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल के 'गुंडा दमन विधेयक' को केंद्रीय मादक पदार्थ कानून से संभावित टकराव के कारण पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।
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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली नई भाजपा सरकार की ओर से लाए गए 'गुंडा दमन विधेयक' को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने केंद्रीय मादक पदार्थ कानून (एनडीपीएस एक्ट) से इसके एक प्रविधान के संभावित टकराव को देखते हुए विधेयक को पुनर्विचार अथवा संशोधन के लिए राज्य सरकार के पास वापस भेज दिया है।
इसके चलते बंगाल विधानसभा से जून माह में ही पारित होने के बावजूद 'वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल आफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026' अभी कानून का रूप नहीं ले सकेगा।
इस घटनाक्रम को लेकर तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व सांसद अभिषेक बनर्जी ने राज्य सरकार पर कटाक्ष किया है। उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर शुक्रवार को लिखा कि पोस्टर में डबल इंजन। शासन में रिवर्स गियर। होमवर्क सीधे वापस!
एनडीपीएस कानून से टकराव पर केंद्र की आपत्ति
बंगाल में मई में हुए सत्ता परिवर्तन व भाजपा के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली सरकार ने 29 जून को विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर यह विधेयक पारित कराया था।
इसका उद्देश्य असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए प्रशासन को अतिरिक्त अधिकार देना है। इसके तहत असामाजिक क्रियाकलाप में लिप्त व्यक्ति को बिना सुनवाई के एक साल तक हिरासत में रखने का प्रावधान किया गया है।
साथ ही जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त अथवा डीआईजी स्तर के पुलिस अधिकारी को किसी असामाजिक तत्व को किसी निश्चित क्षेत्र या जिले से अधिकतम एक वर्ष के लिए बाहर रखने का अधिकार देने का प्रविधान किया गया है।
विधेयक के एक प्रविधान पर केंद्र ने आपत्ति जताई है। इसमें एनडीपीएस अधिनियम, 1985 के तहत दंडनीय अपराध में शामिल व्यक्ति को भी 'गुंडा' की परिभाषा के दायरे में रखा गया है। केंद्र का कहना है कि मादक पदार्थों की अवैध तस्करी में शामिल लोगों की निवारक हिरासत के लिए 1988 का पीआइटीएनडीपीएस अधिनियम पहले से मौजूद है।
ऐसे में राज्य के प्रस्तावित कानून से समान मामलों में दो अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
संशोधन कर फिर विधानसभा में लाया जा सकता है विधेयक
केंद्र ने इस संभावित टकराव को संविधान के अनुच्छेद 254 से जुड़ा विषय माना है। राज्य सरकार को सुझाव दिया गया है कि एनडीपीएस अधिनियम से टकराव वाले हिस्से को हटाकर विधेयक में आवश्यक संशोधन किया जाए। इसके बाद संशोधित विधेयक को दोबारा विधानसभा में पेश कर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है।
राज्य प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार सरकार इस कानून को जल्द लागू करना चाहती थी, इसलिए विधेयक का वापस आना उसके लिए बाधा है। हालांकि सरकार के पास आपत्ति वाले प्रविधान में संशोधन कर इसे फिर से विधानसभा से पारित कराकर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजने का रास्ता खुला है।
