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आपदाओं के जरिए हिसाब मांगती दिखेगी प्रकृति, पर्यावरण से खिलवाड़ रोकने का संदेश देगा बोसपुकुर का पंडाल

Published: Sun, 27 Sep 2026 07:18 PM (IST)

बोसपुकुर शीतला मंदिर दुर्गोत्सव कमेटी ने अपने 77वें वर्ष के लिए 'चुप' थीम चुनी है, जो प्रकृति के प्रतिशोध और मानव सभ्यता द्वारा किए गए पर्यावरणीय विनाश पर केंद्रित है।

बोसपुकुर शीतला मंदिर का पंडाल तैयार करते कारीगर। (फोटो सौजन्य : दुर्गोत्सव कमेटी)

बोसपुकुर शीतला मंदिर का पंडाल तैयार करते कारीगर। (फोटो सौजन्य : दुर्गोत्सव कमेटी)

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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। कभी जिस प्रकृति की गोद में मानव सभ्यता ने आंखें खोली थी, आज वही प्रकृति इंसान के सामने ‘प्रतिशोधी’ के रूप में खड़ी दिखाई दे रही है। विकास व आधुनिकता की अंधी दौड़ में इंसान ने जंगल काटे, नदियों को प्रदूषित किया, पहाड़ों का सीना छलनी किया और वातावरण में कार्बन उत्सर्जन बढ़ाता चला गया।

उसे लगा कि प्रकृति कमजोर है और उसके संसाधनों पर उसका असीम अधिकार है लेकिन अब प्रकृति चक्रवात, बाढ़, सूखा, भूस्खलन व अन्य आपदाओं के जरिए अपने जख्मों का हिसाब मांगती नजर आ रही है।

बोसपुकुर शीतला मंदिर दुर्गोत्सव कमेटी ने अपने 77वें वर्ष में इसी गंभीर विश्वव्यापी परिस्थिति को अपनी थीम बनाया है और इसे नाम दिया है-चुप। तुषार कांति प्रधान इस थीम को मूर्त रूप दे रहे हैं। पूजा कमेटी के सचिव काजल सरकार ने बताया-‘हमारी इस वर्ष की प्रस्तुति मानव सभ्यता के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है-क्या विकास की कीमत प्रकृति का विनाश हो सकती है?

pooja pandal

हम इस थीम के जरिए यह संदेश देने की कोशिश करेंगे कि प्रकृति पर अत्याचार की एक सीमा है। जब वह सीमा पार होती है तो प्रकृति अपने तरीके से जवाब देती है। मनुष्य ने सभ्यता के विकास के साथ प्रकृति से बहुत कुछ लिया। भोजन, पानी, हवा, जमीन और खनिज-हर जरूरत के लिए प्रकृति पर निर्भर रहा लेकिन जरुरतें धीरे-धीरे लालच में बदल गईं। विकास की गति बढ़ाने के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ किया गया।

प्रकृति लंबे समय तक इसे सहती रही। इंसान को लगने लगा कि वह प्रकृति को अपने नियंत्रण में ले चुका है। हमारी थीम इस भ्रम को तोड़ेगी। संदेश साफ है-प्रकृति शांत जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं। हमारी थीम में प्रकृति को ऐसे शक्ति स्वरूप में दिखाया जाएगा, जो लंबे समय तक इंसान की गलतियां सहने के बाद अब प्रतिशोध के लिए तैयार है। यह प्रतिशोध किसी युद्ध की तरह नहीं, बल्कि उसके अपने रौद्र रूप में सामने आता है। चक्रवात, बाढ़, सूखा, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाएं इसकी चेतावनी हैं।’

Durga pooja pandal

राजनीतिक प्रभाव, सत्ता का प्रदर्शन और सैन्य शक्ति की होड़ ने भी पर्यावरण को पहुंचाया भारी नुकसान

काजल सरकार ने आगे कहा-‘थीम में आधुनिक दुनिया की एक और बड़ी विडंबना को सामने रखा जाएगा। राजनीतिक प्रभाव, सत्ता का प्रदर्शन और सैन्य शक्ति की होड़ ने भी पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है।

वैज्ञानिक व तकनीकी प्रगति का इस्तेमाल जहां मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हो सकता था, वहीं उसका एक बड़ा हिस्सा विनाशकारी क्षमता बढ़ाने में लगाया गया। युद्धों ने धरती को जख्म दिए। विनाशकारी हथियारों के इस्तेमाल और लगातार बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा ने पर्यावरण पर गहरा असर डाला।

संदेश यह है कि सत्ता और शक्ति की लड़ाई में मनुष्य अक्सर भूल जाता है कि अंततः उसे जीना इसी धरती पर है।’ बोसपुकुर की थीम का सबसे प्रभावी पक्ष यही विचार है कि प्रकृति की चुप्पी को उसकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। इंसान जितना प्रकृति पर अपना अधिकार जताता गया, उतना ही उसने अपने अस्तित्व की नींव को कमजोर किया। प्रकृति किसी अदालत में मुकदमा नहीं लड़ती, लेकिन उसके फैसले दिखाई देते हैं।

समुद्र का बढ़ता जलस्तर, मौसम का बदलता मिजाज, असामान्य बारिश, दीर्घकालिक सूखा और अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाएं उसी बदलते संतुलन की तस्वीरें हैं। थीम वार्ता देती है कि प्रकृति को नष्ट करना दरअसल खुद को नष्ट करने के बराबर है। बोसपुकुर की प्रस्तुति केवल देवी दुर्गा का दर्शन नहीं होगी बल्कि दर्शनार्थियों को आत्ममंथन के लिए भी बाध्य करेगी।

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