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इतिहास बनने से बचेगी कोलकाता की ट्राम, पीपीपी मॉडल पर नए रूप में दौड़ाने की तैयारी

By Vishal ShresthaEdited By: Shubham Tiwari
Published: Sun, 01 Nov 2026 05:58 PM (IST)

पश्चिम बंगाल सरकार कोलकाता की 153 साल पुरानी ट्राम विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी ...और पढ़ें

नोनापुकुर सेंट्रल वर्कशाप में वर्षों से बेकार पड़ी एक ट्राम

नोनापुकुर सेंट्रल वर्कशाप में वर्षों से बेकार पड़ी एक ट्राम

विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। इतिहास में सिमटने से बचाई जा रही कोलकाता की सड़कों पर कभी शहर की धड़कन बनकर दौड़ने वाली ट्राम की गाथा बहुत स्वर्णिम है। इस विरासत को फिर से जीवंत क्यों ने किया जाए, इसने 153 वर्षों की अपनी स्वर्णिम यात्रा तय की है।

बंगाल सरकार जिस ट्राम को फिर से दौड़ा कर इस विरासत को फिर जीवंत करने की कोशिश में जुटी है, कोलकाता की सड़कों पर कभी जब इसकी घंटी बजती थी तो लगता था कि शहर की जिंदगी अपनी लय में आगे बढ़ रही है। खिड़की के पास बैठकर बाहर का नजारा देखते हुए सफर करना, परिचित बाजारों और गलियों से गुजरना और महज कुछ रुपयों में मंजिल तक पहुंच जाना, इसके सफर का खास अनुभव होता था।

किसी के लिए यह दफ्तर पहुंचने का भरोसेमंद साधन थी तो किसी के लिए स्कूल-कालेज जाने की साथी। इसकी रफ्तार में भी एक सुकून था। यही वजह रही कि यह महज परिवहन का साधन नहीं, कोलकाता की संस्कृति, पहचान और कई पीढ़ियों की यादों का हिस्सा बनी रही। अब बंगाल सरकार ने इस विरासत को फिर जीवंत करने की दिशा में पहल की है।

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सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) माडल पर ट्राम के पुनरुद्धार और आधुनिकीकरण की संभावनाएं सरकार तलाश रही है। आस्ट्रेलिया और बेलारूस की कंपनियों ने इसमें रुचि भी दिखाई है। सरकार ने ट्राम नेटवर्क की व्यवहार्यता का अध्ययन करने के लिए रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकोनामिक सर्विस (आरआइटीईएस) को जिम्मेदारी सौंपी है।

प्रस्ताव के अनुसार ट्राम का बुनियादी ढांचा सरकार के पास रहेगा और निजी भागीदार केवल इसके संचालन व आधुनिकीकरण में सहयोग करेंगे। यह पहल केवल एक पुराने परिवहन साधन को फिर से शुरू करने की कवायद नहीं, कोलकाता की पहचान और उसकी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की कोशिश भी कही जा रही है।

करीब 70 पुराने मार्गों पर संचालन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। आधुनिक वातानुकूलित और बैटरी चालित ट्रामों के विकल्पों पर भी विचार हो रहा है। ट्राम को फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित ट्रैक, सुरक्षित पटरियां, बेहतर सिग्नलिंग और मेट्रो से जुड़ाव जरूरी होगा। कोशिश यही है कि कोलकाता की यह 153 साल पुरानी पहचान इतिहास के पन्नों तक सीमित न रह जाए, उसकी घंटी फिर शहर की सड़कों पर सुनाई दे।

इस तरह हुई शुरुआत और पकड़ती गई गति

ट्राम के स्वर्णिम सफर की शुरुआत 24 फरवरी 1873 को हुई थी। सियालदह से आर्मेनियन घाट के बीच 3.9 किलोमीटर की दूरी पर घोड़ों से खिंचने वाली ट्राम चलाई गई। शुरुआती प्रयोग सफल नहीं रहा और नवंबर 1873 में सेवा बंद करनी पड़ी। नवंबर 1880 में ट्राम ने फिर वापसी की। वर्ष 1882 में भाप से चलने वाली ट्राम आई और आगे चलकर बिजली से चलने वाली ट्राम ने शहर की सड़कों पर अपनी जगह बना ली।

बाजारों, दफ्तरों, स्कूल-कालेज, रेलवे स्टेशन और औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ने वाली इस सवारी ने कोलकाता के सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी गति दी। मजदूरों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों और कारोबारियों के लिए यह सस्ता और सुविधाजनक विकल्प थी।

मेट्रो की रफ्तार ने इस पर लगाया ब्रेक

बीसवीं सदी के मध्य में ट्राम का स्वर्णिम दौर था। एक समय शहर में करीब 450 ट्राम चलती थीं और नेटवर्क लगभग 100 किलोमीटर तक फैला था, लेकिन 1984 में मेट्रो सेवा शुरू होने के बाद परिवहन के नए विकल्प बढ़े और ट्राम का संचालतन धीरे-धीरे कई मार्गों पर बंद होता गया।

कभी दो दर्जन से अधिक मार्गों पर दौड़ने वाली ट्राम अब केवल दो मार्गों-गारियाहाट से एस्प्लेनेड और एस्प्लेनेड से श्यामबाजार तक सिमट गई है। करीब 11-12 किलोमीटर के दायरे में ही इसका संचालन हो रहा है। डिपो में 268 ट्राम खड़ी हैं, जबकि प्रतिदिन मुश्किल से सात-आठ ट्राम ही पटरियों पर उतर पाती हैं।

ट्राम को बचाने की उठती रही आवाज

इस सिमटते सफर के बीच ट्राम को बचाने की आवाज भी लगातार उठती रही। कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष डा. देवाशीष भट्टाचार्य पिछले तीन दशक से इसके संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए अभियान चला रहे हैं।

एसोसिएशन के सर्वे में 98 प्रतिशत लोगों ने ट्राम के समर्थन में राय दी। इसमें विद्यार्थी, युवा, महिलाएं, वरिष्ठ नागरिक और दिव्यांगजन शामिल रहे। डा. भट्टाचार्य का कहना है कि ट्राम को यातायात की समस्या का कारण बताकर गलत तरीके से खलनायक बना दिया गया, जबकि यह सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन है।

लोगों की राय

करीब 40 साल तक ट्राम में कंडक्टर रहे दरभंगा के जगन्नाथ झा भी इस धारणा से सहमत नहीं हैं कि ट्राम केवल बुजुर्गों और दिव्यांगों के काम आती थी। उन्होंने हर उम्र के लोगों को इससे सफर करते देखा है। करीब 40 साल से ट्राम में यात्रा कर रहे 72 वर्षीय जयदीप मुखर्जी का कहना है कि पटरियों को अतिक्रमण से मुक्त रखा जाए और यातायात व्यवस्था सुधारी जाए तो ट्राम फिर उपयोगी साबित हो सकती है।

गारियाहाट ट्राम डिपो के एक कर्मचारी के अनुसार, नई तकनीक और बैटरी से चलने वाली ट्रामों के जरिये इसके पुराने दिन लौटाए जा सकते हैं।

पुरानी दिल्ली में भी ट्रैकलेस ट्राम की तलाशी जा रहीं संभावनाएं

कोलकाता में ट्राम के पुनरुद्धार की कोशिशों के बीच दिल्ली के पुरानी शाहजहानाबाद में भी ट्राम जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की संभावना तलाशी जा रही हैं। शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम (एसआरडीसी) की हालिया बैठक में दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन (डीएमआरसी) को ट्रैकलेस ट्राम प्रणाली की व्यवहारिकता का अध्ययन करने के निर्देश दिए गए हैं। इसका उद्देश्य पुरानी दिल्ली की भीड़भाड़ और संकरी सड़कों पर आवागमन सुगम करना तथा प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों के बीच संपर्क बेहतर बनाना है।

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