कोलकाता दुर्गापूजा में भीड़ का कॉरपोरेट कनेक्शन, जितनी भीड़ उतनी स्पॉन्सरशिप, इस साल 1000 करोड़ की फंडिंग का अनुमान
कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडालों में अब भीड़ जुटाने के पीछे कॉर्पोरेट फंडिंग का गणित है, जहां अधिक भीड़ से ...और पढ़ें

HighLights
कॉर्पोरेट फंडिंग के लिए दुर्गा पूजा में भीड़ जुटाना अनिवार्य।
इस साल 1000 करोड़ रुपये की स्पॉन्सरशिप की उम्मीद।
पूजा समितियां आकर्षक थीम और प्रचार रणनीति अपना रही हैं।
विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता। कोलकाता के दुर्गापूजा पंडालों में पहले स्वतः स्फूर्त भीड़ उमड़ती थी, अब भीड़ जुटाई जाती है। इसके पीछे एक पूरा गणित काम करता है। मसलन, जितनी अधिक भीड़, उतनी लोकप्रियता और पूजा समितियों को कंपनियों से उतनी ही अधिक फंडिंग। दूसरी तरफ कंपनियों को चंद दिनों में आसानी से अपने संभावित ग्राहकों के एक बड़े वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता है।
इसके लिए पूजा समितियां प्रत्येक वर्ष एक से बढ़कर एक थीम की परिकल्पना करती हैं फिर उनपर पंडाल निर्मित किए जाते हैं और उनके प्रचार के लिए आक्रामक रणनीति तैयार करती हैं। दुर्गापूजा के कई दिनों पहले से ये तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस साल 1000 करोड़ रुपये तक की कॉरर्पोरेट स्पॉन्सशिप मिलने की उम्मीद है।
स्पॉन्सशिप पाने के लिए भीड़ जुटाना बाध्यता
उत्तर कोलकाता की प्रमुख दुर्गापूजा समिति दमदम पार्क के संयुक्त सचिव मलय दे बताते हैं कि कोलकाता की दुर्गापूजा का स्वरूप साल-दर-साल बड़ा होता जा रहा है। प्रत्येक पूजा समिति का बजट बढ़ रहा है। बड़ी पूजा समिति के लिए अब बगैर कॉरपोरेट स्पॉन्सशिप के पूजा का आयोजन करना संभव नहीं है।
पूजा का 60-70 प्रतिशत खर्च अब कंपनियां ही वहन करती हैं। कंपनियां स्पॉन्सशिप के लिए पूजा समितियों की लोकप्रियता और उनके पंडालों में उमड़ने वाली भीड़ को ही मुख्य आधार बनाती हैं। ऐसे में मोटी स्पॉन्सशिप पाने के लिए हर साल अपने पंडाल में भारी भीड़ जुटाना पूजा समितियों के लिए एक तरह से बाध्यता हो जाती है।
अब भीड़ से ही होती है ब्रांडिंग
हावड़ा की प्रमुख दुर्गापूजा समिति सलकिया अग्रदूत के कोषाध्यक्ष सब्यसाची राय के मुताबिक, पंडालों में भीड़ अब सिर्फ आस्था, उत्साह और कलात्मकता के प्रति आकर्षण का नतीजा नहीं है। भीड़ से ही पूजा समितियों की ब्रांडिंग होती है इसलिए थीम को लेकर 'हाइप' तैयार किया जाता है। बड़ी पूजा कमेटियां अब प्रचार को पेशेवर तरीके से संचालित करती हैं। उनकी अपनी जनसंपर्क टीम होती हैं।
बड़े-बड़े होर्डिंग, सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट, वीडियो तथा प्रचार के दूसरे माध्यमों के जरिये लोगों में थीम के प्रति उत्सुकता पैदा की जाती है। इसका एक और कारण पूजा दर्शनार्थियों की पूजा आयोजकों से बढ़ती उम्मीदें भी हैं। लोग अब कुछ अलग देखना चाहते हैं, वरना घंटों किसी पंडाल के सामने कौन कतार में खड़ा रहना चाहेगा।
