बंगाल विधानसभा चुनाव: जंगलमहल में जाति-जनजाति और कल्याण राजनीति की जंग
बंगाल का जंगलमहल, जो कभी माओवादी हिंसा का गढ़ था, अब 2026 विधानसभा चुनाव का महत्वपूर्ण रणक्षेत्र बन गया है। ...और पढ़ें

बंगाल विधानसभा चुनाव। (फाइल)
HighLights
जंगलमहल 2026 विधानसभा चुनाव का अहम रणक्षेत्र बना।
2021 में भाजपा मजबूत, 2024 में तृणमूल की वापसी।
जातिगत समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं निर्णायक भूमिका में।
जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। कभी माओवादी हिंसा के लिए पहचाना जाने वाला बंगाल का जंगलमहल अब 2026 के विधानसभा चुनाव का सबसे अहम रणक्षेत्र बन चुका है।
पुरुलिया, झाड़ग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, पूर्व मेदिनीपुर और बांकुड़ा जिलों का यह इलाका, वर्ष 2010-11 तक असुरक्षा और अविकास का प्रतीक था, आज राजनीतिक दलों के लिए निर्णायक चुनावी जमीन बन गया है। केंद्र द्वारा माओवादियों के खात्मे की समयसीमा और चुनावी माहौल के मेल ने इस क्षेत्र की अहमियत और बढ़ा दी है।
भाजपा ने दर्ज कराई थी मजबूत उपस्थिति
2021 के विधानसभा चुनाव में जंगलमहल की 56 सीटों पर भाजपा ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी थी। भाजपा ने 23 सीटें जीतकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। जिला-वार देखें तो पूर्व मेदिनीपुर में 16 में से सात, पुरुलिया में नौ में से छह और बांकुड़ा में 12 में से आठ सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। वोट शेयर के स्तर पर मुकाबला बेहद करीबी रहा, जहां तृणमूल को लगभग 46 प्रतिशत और भाजपा को करीब 45 प्रतिशत वोट मिले थे।
2024 में बदल गई थी तस्वीर
2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने इस समीकरण को बदलने के संकेत दिए। जंगलमहल से जुड़ी लोकसभा सीटों -पुरुलिया, झाड़ग्राम, मेदिनीपुर, बांकुड़ा, विष्णुपुर, तमलुक और कांथी-में तृणमूल कांग्रेस ने झाड़ग्राम, मेदिनीपुर और बांकुड़ा जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज कर वापसी की।
भाजपा ने पुरुलिया, विष्णुपुर, तमलुक और कांथी सीटों को अपने पास बनाए रखा। विधानसभा क्षेत्रवार बढ़त के आंकड़े बताते हैं कि तृणमूल ने पूरे क्षेत्र की लगभग 65 प्रतिशत सीटों पर बढ़त हासिल की, जो 2021 की तुलना में भाजपा के लिए चेतावनी संकेत माना जा रहा है।
जातिगत गणित और रणनीति
2026 के चुनाव में क्षेत्र की लड़ाई अब जातीय और सामाजिक समीकरणों के ईद-गिर्द सिमटती दिख रही है। आदिवासी (विशेषकर संथाल), कुड़मी समुदाय और कुछ इलाकों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। भाजपा जहां हिंदू मतों के एकजुट करने और कुड़मी समुदाय को साधने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं तृणमूल अपनी कल्याणकारी योजनाओं-'लक्ष्मी भंडार', 'युवा साथी' और 'स्वास्थ्य साथी'-के जरिए ग्रामीण और कमजोर वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है।
जनगणना 2011 के अनुसार, पूर्व मेदिनीपुर में मुस्लिम आबादी लगभग 15 प्रतिशत, पश्चिम मेदिनीपुर में करीब 11 प्रतिशत और बांकुड़ा व पुरुलिया में लगभग 8 प्रतिशत है। इन जिलों में मुस्लिम आबादी का एकमुश्त मतदान परिणामों को प्रभावित करता है।
वर्तमान मुद्दे और प्रत्याशियों का चयन
चुनावी रणनीति के स्तर पर भाजपा ने इस बार स्थानीय चेहरों और 'भूमिपुत्र' उम्मीदवारों पर जोर दिया है, ताकि जमीनी जुड़ाव को मजबूत किया जा सके। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस अनुभव और युवा नेतृत्व के मिश्रण के साथ सत्ता विरोधी रुझान को संतुलित करने की कोशिश कर रही है।
भ्रष्टाचार और केंद्रीय फंड का मुद्दा अभी भी राजनीतिक विमर्श में है, लेकिन सड़क, आवास और अन्य बुनियादी ढांचे में हुए विकास ने मतदाताओं के नजरिए को भी प्रभावित किया है।
