कोलकाता, जयकृष्ण वाजपेयी। Bengal Politics  देश में किसी ने भी गठबंधन की राजनीति की कल्पना नहीं की थी। आजादी के महज 20 वर्षो के बाद 15 मार्च 1967 को बंगाल में प्रथम संयुक्त फ्रंट की सरकार बनी थी। 1962 में बंगाल में विधानसभा चुनाव के समय गठबंधन की अवधारणा ने जन्म लिया था और कांग्रेस के खिलाफ यूनाइटेड लेफ्ट इलेक्शन कमेटी तथा यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट ने चुनाव लड़ा था। 1977 से लेकर 2011 तक सरकार में रहते हुए और इसके बाद भी अब तक वाममोर्चा कायम है। भले ही सभी वाम दल शून्य हो चुके हैं, पर 34 वर्षो के वाम शासन को खत्म करने के लिए तृणमूल ने भी कांग्रेस से गठबंधन किया था और इस उद्देश्य में सफल भी हुई। वैसे ज्यादा दिन गठबंधन नहीं टिका।

अभी पिछले सप्ताह कालीपूजा पंडाल के उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, ‘कांग्रेस अविश्वसनीय सहयोगी है जिसने भाजपा से हाथ मिला लिया है।’ इसपर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने पलटवार करते हुए कहा, ‘उन्होंने (ममता) असल में हमारी पार्टी को खत्म करने के लिए भाजपा से सुपारी ले रखी है।’ यानी दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की पार्टी की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर ‘अविश्वसनीय’ सहयोगी कौन है- तृणमूल या फिर कांग्रेस? कांग्रेस और तृणमूल दोनों एक-दूसरे पर भाजपा से हाथ मिलाने का आरोप लगा रहे हैं।

ममता का कहना है कि उन्हें यह उम्मीद क्यों करनी चाहिए कि कांग्रेस का तृणमूल समर्थन करेगी, जबकि उसने पिछले विधानसभा चुनाव में बंगाल की हर सीट पर चुनाव लड़ा था। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नीतियां नहीं हो सकतीं। 2011 में बनी तृणमूल की पहली सरकार के दौरान कांग्रेस ने बीच में साथ छोड़ दिया। यहां बताना जरूरी है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में ममता कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थीं और यूपीए-2 (संप्रग) सरकार का हिस्सा थीं, लेकिन सितंबर 2012 में मनमोहन सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में बढ़ोतरी और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के मुद्दे पर संप्रग से नाता तोड़ लिया। इसके बाद बंगाल में कांग्रेस भी तृणमूल सरकार से अलग हो गई।

दरअसल कांग्रेस से अलग होकर एक जनवरी, 1998 को ममता ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। उस समय उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन राज्य नेतृत्व पर वामपंथियों के साथ साठगांठ का आरोप लगाते हुए अपनी पार्टी बनाई थी। इसके बाद ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में शामिल हुईं। वर्ष 1999 में भी ममता बनर्जी की पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर ही बंगाल में लोकसभा का चुनाव लड़ा और वह फिर से केंद्र सरकार में शामिल हुईं। परंतु डेढ़ साल के अंदर ही वह रेलमंत्री के पद से इस्तीफा देकर 2001 में राजग से बाहर आ गईं और कांग्रेस के साथ मिलकर बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ीं और 60 सीटें जीतीं। फिर वर्ष 2003 के अंत में वह कांग्रेस से नाता तोड़कर भाजपा के साथ गठबंधन कर केंद्रीय मंत्री बन गईं। इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद फिर वह राजग से अलग हो गईं।

उधर, संप्रग सरकार को माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया। परंतु 2008 में अमेरिका से परमाणु संधि पर हस्ताक्षर के खिलाफ समर्थन वापस ले लिया। इसके अगले ही साल 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले तृणमूल और कांग्रेस के बीच समझौता हो गया, जो 2012 में फिर टूट गया। इसके बाद ममता ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। अब तीसरी बार बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के बाद ममता को लगने लगा है कि वह कांग्रेस की जगह ले सकती हैं। यही वजह है कि वह अब उसे ‘अविश्वसनीय’ सहयोगी करार दे रही हैं।

इधर कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि जितनी बार गठबंधन ममता ने तोड़ा है, उससे पता चलता है कि कौन ‘विश्वसनीय’ और कौन ‘अविश्वसनीय’ है? दूसरी तरफ तृणमूल प्रमुख ने सवाल किया है कि कांग्रेस ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को हराने के लिए माकपा के साथ गठबंधन क्यों किया? वर्ष 1998 से 2004 तक भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार का हिस्सा होने को लेकर ममता ने कहा कि उन्होंने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर राजग के साथ गठबंधन किया था। 

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, बंगाल]

Edited By: Sanjay Pokhriyal