राजीव कुमार झा, कोलकाता। बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर कई कद्दावर मंत्रियों से लेकर एक दर्जन से ज्यादा विधायकों ने भाजपा का दामन थामा था। हालांकि चुनाव में इनमें से कद्दावर नेता व पूर्व मंत्री सुवेंदु अधिकारी सहित एक- दो विधायक ही अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे जबकि अधिकतर दलबदलुओं को जनता ने खारिज कर दिया। अब चुनाव हार चुके अधिकतर दलबदलू नेता जिनमें कई बड़े नाम भी हैं, भाजपा के लिए मुसीबत बन गए हैं।

बंगाल में उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं करने के बाद भाजपा के सामने अब बड़ी समस्या पैदा हो गई है कि आखिर तृणमूल छोड़कर आने वाले इन नेताओं को पार्टी में कैसे व किस रूप में एडजस्ट किया जाए। इसको लेकर पार्टी के भीतर माथापच्ची की जा रही है। दूसरा, उम्मीद के अनुसार पार्टी का प्रदर्शन नहीं होने पर इन दलबदलू नेताओं के खिलाफ दल के भीतर विरोध के स्वर भी दिखाई देने लगे हैं। इससे पहले टिकट वितरण के दौरान भी तृणमूल छोड़कर आने वाले नेताओं को टिकट देने को लेकर भारी विरोध हुआ था।

पार्टी पर आरोप लगा था कि जिन्होंने सालों से मेहनत की, तृणमूल का अत्याचार सहा उन्हें दरकिनार कर दूसरे दलों से आए लोगों को तरजीह दी गई। वहीं, परिणाम आने के बाद इनमें से अधिकतर नेताओं की करारी हार के बाद विरोध और तेज हो गया है। दबी जुबान में प्रदेश भाजपा से लेकर विभिन्न जिलों व बूथ स्तर के नेता यह कह रहे हैं कि तृणमूल से इतनी बड़ी संख्या में आए नेताओं के कारण ही पार्टी उम्मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी यानी जनता का आशीर्वाद नहीं मिला। ऐसे में पार्टी के भीतर उभरे विरोध से लेकर अब दलबदलुओं को संभालना एक बड़ी चुनौती है।

तृणमूल की आंधी में सुवेंदु को छोड़ सभी बड़े नेता हो गए धाराशाई: चुनाव से पहले तृणमूल छोड़कर आए सुवेंदु अधिकारी सिर्फ नंदीग्राम सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराकर अपनी बादशाहत सिद्ध की। बाकी सभी बड़े नेता तृणमूल की आंधी में धराशाई हो गए। सुवेंदु के बाद चुनाव से पहले भाजपा में आने वाले दूसरे सबसे बड़े नेता व पूर्व मंत्री राजीब बनर्जी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। हावड़ा की डोमजूर सीट से 2016 के विधानसभा चुनाव में बंगाल में सबसे ज्यादा वोटों एक लाख से भी ज्यादा से जीत दर्ज करने वाले बनर्जी को 42 हजार से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा बहुचर्चित सिंगुर आंदोलन में ममता बनर्जी के साथी रहे पूर्व मंत्री रवींद्रनाथ भट्टाचार्य भी 25,923 वोटों से हार गए।

90 वर्षीय भट्टाचार्य टिकट नहीं मिलने पर भाजपा में शामिल हो गए थे। इसी तरह आसनसोल के पूर्व मेयर व विधायक जितेंद्र तिवारी एवं विधाननगर के पूर्व मेयर व विधायक सब्यसाची दत्ता को भी हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह हावड़ा की बाली सीट से विधायक रहीं और बीसीसीआइ के पूर्व अध्यक्ष दिवंगत जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली डालमिया भी चुनाव से ठीक पहले तृणमूल छोड़ भाजपा में आईं, लेकिन उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। हावड़ा के पूर्व मेयर डॉ रथीन चक्रवर्ती एवं हुगली के उत्तरपाड़ा से विधायक प्रबीर घोषाल भी हार गए। इस सूची में कई और पूर्व विधायक व फिल्मी स्टार तक शामिल हैं जो चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हुए थे, जिन्हें हार का सामना करना पड़ा।‌ अब संघ व भाजपा की नीतियों पर ये सभी नेता कैसे व किस रूप में टिक पाएंगे यह देखने की बात है। साथ ही पार्टी नेतृत्व इनके लिए क्या रास्ता निकालती है इस पर सभी की नजरें हैं।

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप