बंगाल में सरकारी पानी की बोतलों का रंग भी नीले से हुआ भगवा, ‘प्राणधारा’ का नाम अब ‘गंगाधारा’
पश्चिम बंगाल में सरकारी पेयजल की बोतलों का नाम 'प्राणधारा' से बदलकर 'गंगाधारा' कर दिया गया है, साथ ही उनके ...और पढ़ें

बंगाल में सरकारी बोतलों का रंग बदला। (फोटो-जागरण)
HighLights
सरकारी पानी की बोतलें अब 'प्राणधारा' से 'गंगाधारा'
बोतलों का नीला रंग बदलकर हुआ भगवा
स्कूलों के पाठ्यक्रम में 'पानी' की जगह 'जल'
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में सत्ता परिवर्तन व भाजपा की सरकार बनने के बाद से सरकारी व्यवस्था के रंग-रूप से लेकर विभिन्न योजनाओं व उत्पादों के नाम बदलने की प्रक्रिया के बीच अब सरकारी पेयजल की बोतलों का नाम, रंग और डिजाइन भी बदल दिया गया है।
पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के समय ‘प्राणधारा’ नाम से उपलब्ध पानी की बोतलें अब ‘गंगाधारा’ नाम से पेश की गई हैं। इनके लेबल और ढक्कन का रंग भी नीले से बदलकर भगवा कर दिया गया है। राज्य के जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) की ओर से तैयार कराई जाने वाली इन पानी की बोतलों की आपूर्ति विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में की जाती है।
तृणमूल सरकार के दौरान इन बोतलों पर ‘प्राणधारा’ नाम लिखा होता था। इनके लेबल पर नीले और सफेद रंग का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि ढक्कन भी नीले रंग का होता था। अब इन बोतलों को ‘गंगाधारा’ नाम दिया गया है।
इस तरह राज्य सचिवालय नवान्न की सजावट से लेकर रेलिंग और सरकारी निमंत्रण पत्रों तक में रंगों में बदलाव कर भगवा रंग का इस्तेमाल दिखाई देने के के बाद अब सरकारी कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाले पानी की बोतल में भी यह परिवर्तन नई सरकारी पहचान की एक और कड़ी है।
नवान्न से बैरिकेड तक दिख रहा बदलाव
दरअसल, भाजपा सरकार बनने के बाद राज्य सचिवालय के रंग-रूप में बदलाव के साथ अन्य सरकारी परिसरों और सार्वजनिक व्यवस्थाओं में भी भगवा रंग का इस्तेमाल चर्चा में रहा है। सड़कों की रेलिंग, बैरिकेड और सरकारी कार्यक्रमों से जुड़े कुछ अन्य साज-सज्जा में भी यह रंग दिखाई दे रहा है। ‘प्राणधारा’ से ‘गंगाधारा’ तक का बदलाव इस प्रक्रिया का ताजा उदाहरण है।
स्कूलों में अब बच्चे पढ़ेंगे 'पानी' को 'जल', 'अब्बा' को 'बाबा'
दूसरी ओर, राज्य के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बांग्ला भाषा की किताबों में जल्द बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सुख्यमंत्री शुभेदु अधिकारी की अगुवाई वाली सरकार की ओर से गठित पाठ्यक्रम समीक्षा समिति ने किताबों में इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को बदलने और इतिहास के पाठ्यक्रम में संशोधन करने की सिफारिश की है।
कल्याणी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देबाशीष चटर्जी जो इस समिति के प्रमुख हैं, ने बताया कि समिति ने बांग्ला भाषा की किताबों से 'पानी', 'अब्बा' और 'अम्मी' जैसे शब्दों को हटाने का फैसला किया है।
प्रस्ताव के मुताबिक, किताबों में 'पानी' की जगह 'जल' और 'अब्बा' की जगह 'बाबा' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाएगा। बांग्ला में बाबा पिता को कहा जाता है। समिति का लक्ष्य नई पाठ्यपुस्तकों का पहला संस्करण जनवरी, 2027 तक तैयार करना है।
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