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बंगाल के बशीरहाट में 500 साल पुराना मां भवानी मंदिर, जहां डाकू भी पूजा के बाद बढ़ाते थे कदम

By Milan Kumar ShuklaEdited By: Deepak Gupta
Published: Tue, 03 Nov 2026 06:02 PM (IST)

गोखना गांव में जंगल के बीच स्थित मां भवानी का मंदिर भी ऐसा ही एक स्थल है। स्थानीय मान्यताओं के ...और पढ़ें

बंगाल के बशीरहाट में है 500 साल पुराना मां भवानी मंदिर।

बंगाल के बशीरहाट में है 500 साल पुराना मां भवानी मंदिर।

HighLights

  1. बशीरहाट का 500 साल पुराना मां भवानी मंदिर।

  2. डाकू लूटपाट से पहले और बाद में करते थे पूजा।

  3. स्थानीय लोग मांग रहे मंदिर को विरासत का दर्जा।

मिलन कुमार शुक्ला, कोलकाता। बंगाल की धरती पर कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी लोककथाएं और इतिहास भी उन्हें विशिष्ट बनाते हैं।

उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट महकमे के बादुड़िया ब्लॉक के गोखना गांव में जंगल के बीच स्थित मां भवानी का मंदिर भी ऐसा ही एक स्थल है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, करीब 500 से 550 वर्ष पुराने इस मंदिर में कभी डाकू भी माथा टेकने आते थे। मान्यता है कि वे लूटपाट के लिए निकलने से पहले मां की पूजा करते और लौटने पर भी मंदिर में हाजिरी लगाते थे।

इसे गोखना काली मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय लोगों ने बातचीत में बताया कि पुराने समय में यह इलाका घने जंगलों से घिरा था। उस दौर में मंदिर की दीवारें मिट्टी की थीं और छत खपरैल तथा गोलपत्तों से बनी थी। यहां मां की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती थी।

डाकुओं से जुड़ी एक अन्य लोककथा में मंदिर के तालाब का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि डकैती पर निकलने से पहले वे तालाब में स्नान करते थे। हालांकि, इन कथाओं के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय समाज में ये पीढ़ियों से प्रचलित हैं।

काशी से लाई गई थी पत्थर की प्रतिमा

समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदला और यहां पत्थर की प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा के आगमन को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। एक स्थानीय इतिहास में इसे काशी से लाए जाने का उल्लेख है, जबकि दूसरे विवरण के अनुसार, करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले प्रतिमा कृष्णनगर से लाई गई थी।

मंदिर की दीवार पर दर्ज जानकारी के मुताबिक, बंगाली संवत 1319 की 16 वैशाख (बांग्ला कैलेंडर) को पक्के मंदिर का निर्माण कराया गया था। बाद में 1388 में इसका जीर्णोद्धार हुआ। मंदिर की एक खास परंपरा यह है कि पूजा में इस्तेमाल होने वाला पुराना घट आज भी सुरक्षित रखा गया है।

जमींदार परिवार से जुड़ा है मंदिर का निर्माण

स्थानीय मान्यता है कि धान्यकुड़िया के जमींदार महेंद्रनाथ गाइन ने अपने बीमार बेटे के स्वस्थ होने के बाद मां भवानी के मंदिर का पक्का निर्माण कराया था। इस तरह मंदिर का इतिहास स्थानीय जमींदारी परंपरा और जनआस्था से भी जुड़ता है।

आज भी आसपास के गांवों से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों की मांग है कि इस प्राचीन धार्मिक स्थल को विरासत स्थल का दर्जा मिले, ताकि इसकी ऐतिहासिक पहचान, पुरानी परंपराओं और लोककथाओं को संरक्षित किया जा सके।

 

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