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अरब सागर की गहराइयों में मिली बिजली पैदा करने वाली मछली, फिश का नाम सुनते ही लग जाएगा करंट

Published: Tue, 27 Oct 2026 04:11 PM (IST)

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने दक्षिण-पूर्वी अरब सागर की गहराइयों में बिजली पैदा करने वाली मछली की नई प्रजाति 'टेट्रोनार्स रमणमूर्ति' खोजी है।

बिजली पैदा करने वाली मछली की नई प्रजाति

 बिजली पैदा करने वाली मछली की नई प्रजाति

HighLights

  1. अरब सागर में बिजली पैदा करने वाली मछली की नई प्रजाति खोजी।

  2. 'टेट्रोनार्स रमणमूर्ति' नाम दिया गया।

  3. उत्तरी हिंद महासागर में इस प्रजाति की पहली प्रमाणित खोज।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआइ) के वैज्ञानिकों ने दक्षिण-पूर्वी अरब सागर की गहराइयों में बिजली पैदा करने वाली मछली की नई प्रजाति खोजी है।

इसका नाम पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के गहरे महासागर मिशन के मिशन निदेशक डॉ. एमवी रमणमूर्ति के सम्मान में ‘टेट्रोनार्स रमणमूर्ति रखा गया है, जिनका समुद्री विज्ञान, महासागर अभियांत्रिकी और समुद्री आपदा जोखिम कम करने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरी हिंद महासागर में टेट्रोनार्स प्रजाति की मौजूदगी का यह पहला प्रमाणित अभिलेख है।

इससे भारत के गहरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद अज्ञात जीवों व जैव विविधता को समझने में मदद मिलेगी। खोज का नेतृत्व चेन्नई स्थित जेडएसआइ के समुद्री जीव विज्ञान क्षेत्रीय केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. केके बिनीश और कनिष्ठ शोधार्थी अनिल काशीनाथ ने किया।

अमेरिका के सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी से संबद्ध मोस लैंडिंग मरीन लैबोरेटरीज के पैसिफिक शार्क रिसर्च सेंटर के डॉ. डेविड ए एबर्ट ने भी सहयोग दिया।

नौ नमूनों के अध्ययन से हुई पहचान

वैज्ञानिकों ने भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास से एकत्र किए गए नौ नमूनों के शारीरिक लक्षणों व आनुवंशिक संरचना का अध्ययन कर इस नई प्रजाति की पहचान की।

इसे सामान्य तौर पर 'अरेबियन ब्लैक इलेक्ट्रिक रे' नाम दिया गया है। इसका शरीर गहरे नीले-काले से गहरे भूरे रंग का है। इसके शरीर की बनावट, आंखों के पीछे स्थित श्वसन छिद्रों के आसपास पैपिला की अनुपस्थिति और छोटे विद्युत अंग इसे अन्य संबंधित प्रजातियों से अलग बनाती है।

इस प्रजाति में कुल 99 कशेरुकाएं पाई गई हैं। वैज्ञानिकों ने माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के सीओआइ और एनडी2 जीन का विश्लेषण कर इसकी अलग विकासवादी पहचान की पुष्टि की है। आनुवंशिक अंतर का स्तर संबंधित प्रजातियों के मुकाबले 2.2 से 6.7 प्रतिशत तक पाया गया।

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