तपते समुद्र से उजड़ रहा जीवन: गंभीर खतरे में दुनिया के 96 प्रतिशत कोरल रीफ, रेड जोन में दक्षिण एशिया के सभी 13 क्षेत्र
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के 96% कोरल रीफ गंभीर खतरे में हैं।

दुनिया के 96% कोरल रीफ जलवायु परिवर्तन से अति संकटग्रस्त

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राज्य ब्यूरो, कोलकाता। समुद्री जैव विविधता पर जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार गहराता जा रहा है। जूलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (जेडएसआइ), कोलकाता के विज्ञानी पहली बार किए गए वैश्विक कोरल रीफ पारिस्थितिकी आकलन के सह-लेखक बने हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आइयूसीएन) की रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में समुद्र के तापमान में वृद्धि और समुद्री हीटवेव के प्रभाव को शामिल करने पर दुनिया के 96 प्रतिशत कोरल रीफ क्षेत्र अति संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच गए हैं।
आइयूसीएन की रेड लिस्ट आफ इकोसिस्टम (आरएलई) के तहत किए गए इस पहले वैश्विक आकलन का अनावरण आर्मेनिया के येरेवन में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (काप-17) में किया गया।
दुनिया के 96% कोरल रीफ अति संकटग्रस्त
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 99.8 प्रतिशत कोरल रीफ क्षेत्र इस खतरे की चपेट में है। हालांकि, केवल पिछले 50 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर 24 प्रतिशत क्षेत्र ही अति संकटग्रस्त श्रेणी में थे।
अगले 50 वर्षों में समुद्री तापमान में संभावित वृद्धि को शामिल करने पर यह आंकड़ा 96 प्रतिशत हो गया। रिपोर्ट में अति संकटग्रस्त का अर्थ पारिस्थितिकी तंत्र के समाप्त होने का अत्यधिक जोखिम है, न कि उसका पहले ही नष्ट हो जाना।
दक्षिण एशिया के आकलन में भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और चागोस द्वीपसमूह के करीब 8282.6 वर्ग किमी में फैले 13 पारिस्थितिकी क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
पिछले 50 वर्षों के आंकड़ों में इनमें सात क्षेत्र संकटग्रस्त, चार गंभीर संकटग्रस्त और दो अति संकटग्रस्त श्रेणी में थे। भविष्य के समुद्री तापमान के अनुमान को शामिल करने पर सभी 13 क्षेत्र अति संकटग्रस्त हो गए है।
भारतीय विज्ञानियों का अहम योगदान
भारत के अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, मन्नार की खाड़ी और पाल्क खाड़ी सहित चार प्रमुख कोरल रीफ पारिस्थितिकी क्षेत्र इस आकलन का हिस्सा है। दक्षिण एशिया के कुल 350 निगरानी स्थलों में 162 यानी 46.3 प्रतिशत स्थल भारतीय क्षेत्रों से है।
जेडएसआई के डा. सी रघुनाथन, डा. तमाल मंडल, डा. जेएस योगेश कुमार और डा. चंद्रन रथिनराज ने क्षेत्रीय रिपोर्ट के सह-लेखक के रूप में योगदान दिया।
रिपोर्ट में समुद्री हीटवेव और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली व्यापक कोरल ब्लीचिंग को सबसे बडा खतरा बताया गया है। वर्ष 1998 और 2016 में हुई भीषण ब्लीचिंग की घटनाएं इसके उदाहरण है।
समुद्र के तापमान में वृद्धि से कोरल की रंगत और जीवन क्षमता प्रभावित होती है, जिससे समुद्री जीवों के आवास और जैव विविधता पर भी संकट गहराता है।