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सर्पों की माला, नरमुंडों का हार और पेट पर बिच्छू; जलपाईगुड़ी में पेटकाटी मां के रूप में होती है देवी की आराधना

Published: Mon, 02 Nov 2026 08:06 PM (IST)

जलपाईगुड़ी के मयनागुड़ी में स्थित पेटकाटी मां की प्राचीन प्रतिमा रहस्यमयी है, जिसके पेट पर कटे निशान और बिच्छू की ...और पढ़ें

जलपाईगुड़ी में पूजी जाती हैं पेटकाटी मां

जलपाईगुड़ी में पूजी जाती हैं पेटकाटी मां

HighLights

  1. पेटकाटी मां की प्रतिमा के पेट पर बिच्छू आकृति।

  2. देवी के सिर पर सर्प मुकुट, गले में नरमुंड माला।

  3. काली पूजा में धूमावती चंडी काली के रूप में पूजा।

जागरण संवाददाता, जलपाईगुड़ी । यहां मां दशभुजा हैं, लेकिन काली पूजा के दिन उनकी आराधना पेटकाटी रूप में होती है। जलपाईगुड़ी जिले के मयनागुड़ी की पेटकाटी मां की प्रतिमा रहस्यों के आवरण में है।

काले कष्टिपत्थर से निर्मित इस प्राचीन देवी प्रतिमा का स्वरूप सामान्य काली प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग है। देवी के पेट पर कटे निशान और बिच्छू की आकृति होने के कारण स्थानीय राजवंशी समुदाय के लोग उन्हें पेटकाटी माओ के नाम से पुकारते हैं। देवी के सिर पर सर्पों से सुसज्जित मुकुट है।

गले में नरमुंडों की माला और पूरे शरीर पर सर्पों की माला शोभायमान है। सिर के ऊपरी हिस्से में बिच्छू की आकृति है। देवी की दो आंखें उभरी हुई हैं, जबकि माथे पर त्रिनयन अंकित है। उनके पैरों के नीचे एक महिला आकृति है।

प्रतिमा के एक ओर सियार और दूसरी ओर उल्लू की आकृति भी मौजूद है। देवी के पेट पर कटे निशान और उसके भीतर बिच्छू की आकृति इस प्रतिमा को विशेष पहचान देती है।

मान्यता है कि अतीत में जमीन की खुदाई के दौरान देवी की प्रतिमा मिली थी। खुदाई के समय कुदाल की चोट से प्रतिमा का पेट कट गया था। इसके बाद से देवी का नाम पेटकाटी पड़ गया।

हालांकि, इस प्रतिमा के वास्तविक स्वरूप, इतिहास और प्राचीनता को लेकर आज भी कई रहस्य बने हुए हैं। देवी की प्रतिमा काली की है, चंडी की है अथवा किसी तंत्रदेवी की, इसे लेकर इतिहास और धार्मिक अध्ययन के क्षेत्र में मतभेद हैं।

मयनागुड़ी शहर के पेटकाटी इलाके में स्थित मंदिर में मां की लगभग साढ़े चार फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा कमल के आसन पर विराजमान है। देवी के दस हाथ हैं, लेकिन इनमें से तीन हाथ टूट चुके हैं। प्रतिमा के बचे हुए हाथों में हाथी, घंटा, छिन्न नरमुंड और मानव आकृतियां दिखाई देती हैं।

काली नहीं, चंडी काली के रूप में होती है पूजा

जलपाईगुड़ी के इतिहास शोधकर्ता उमेश शर्मा बताते हैं कि पेटकाटी मां की प्रतिमा काली की है, लेकिन उनकी पूजा चंडी काली के रूप में होती है। काली पूजा के दौरान विशेष रूप से धूमावती चंडी काली देवी के रूप में उनकी आराधना की जाती है।

स्थानीय लोगों के बीच पेटकाटी मां अत्यंत जाग्रत देवी के रूप में प्रसिद्ध हैं। कई स्थानीय लोगों ने जमीन दान देकर मंदिर की स्थापना की थी। इतिहासकारों के अनुसार, अतीत में डुवार्स क्षेत्र भूटान के अधीन था। उस दौर में जमीन की खुदाई के दौरान स्थानीय लोगों को यह रहस्यमयी देवी प्रतिमा मिली थी। इसके बाद प्रतिमा को स्थापित कर मंदिर बनाया गया।

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