सिलीगुड़ी, जागरण संवाददाता। नवरात्रि में पांचवें दिन ओर आसपास के क्षेत्रों में माता स्कंदमाता की आराधना की जा रही है। स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इसी कारण मां के चेहरे पर तेज विद्यमान है। माता स्कंदमाता पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। इन्हें माहेश्वरी और गौरी नाम से भी जाना जाता है।

पर्वतराज की पुत्री होने के कारण माता पार्वती कहलाती हैं। माता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना स्वयं हो जाती है। मां अपने भक्तों पर पुत्र के समान स्नेह लुटाती हैं। माता के आशीष से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। माता कमल के आसन पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। माता स्कंदमाता की उपासना से मन की सारी कुंठा, कलह और द्वेष भाव समाप्त हो जाता है। मां की उपासना से अलौकिक तेज की प्राप्ति होती है।

मन पवित्र होता है। आचार्य पण्डित यशोधर झा ने बताया कि स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती हैं। मां की पूजा से बुद्धि, ज्ञान और विवेक का आशीष प्राप्त होता है। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाएं पूर्ण करती हैं। मां स्कंदमाता की आराधना के लिए अच्छा समय दिन का दूसरा ही है। मां की पूजा में चंपा के फूलों का प्रयोग किया गया । भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजमान हैं। दूसरी व चौथी भुजा में कमल का फूल, तीसरी भुजा से आशीर्वाद दे रही है। इनको इनके पुत्र के नाम से भी पुकारा जाता है। 

मां की कृपा से बुद्धि का विकास होता है और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता होता है। मां की कृपा से पारिवारिक शांति की प्राप्ति होती है।  माँ को  मूंग से बने मिष्ठान का भोग लगाया गया। श्रृंगार में इन्हें हरे रंग की चूडियां चढ़ानी गयी। इनकी उपासना से मंदबुद्धि व्यक्ति को बुद्धि व चेतना प्राप्त होती है, पारिवारिक शांति मिलती है, इनकी कृपा से ही रोगियों को रोगों से मुक्ति मिलती है तथा समस्त व्याधियों का अंत होता है। देवी स्कंदमाता की साधना उन लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ है जिनकी आजीविका का संबंध मैनेजमेंट, वाणिज्य, बैंकिंग अथवा व्यापार से है। मां स्कंदमाता को केले का भोग  भी अति प्रिय है। इसके साथ ही  इन्हें केसर डालकर खीर का प्रसाद भी चढ़ाया गया। 

Posted By: Preeti jha

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