-कहीं लख्खी तो कहीं कोजागरी पूजा की धूम

-13 को आरएसएस की ओर से भी विशेष आयोजन जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी : दुर्गापूजा की समाप्ति के साथ ही शहर के लोग अब शरद पूर्णिमा और लख्खी पूजा की तैयारियों में जुट गए हैं। दूसरी ओर शरद पूर्णिमा यानि गुरू पूर्णिमा मिथिलाचंल के लोग कोजागरी पूजा के रूप में मनाते हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़ी शाखाएं भी 13 अक्टूबर को जोर शोर से शरद पूर्णिमा मनाने की तैयारी में है। इसमें भगवा ध्वज को त्याग, बलिदान और तपस्या का प्रतीक बताते हुए चरित्रवान बनने के लिए प्रेरित किया जाएगा। संघ के लिए विश्व में भारत सबसे प्राचीन राष्ट्र है। भगवा ध्वज के इन्हीं गुणों के चलते संघ ने इसे गुरु माना है। यह यज्ञ के समान पवित्रता, त्याग, तपस्या, उद्योग और उत्सर्ग करने का भाव इस ध्वज से प्राप्त होता है। शारीरिक कार्यक्रम में आसन, व्यायाम, सूर्य नमस्कार कराया जाएगा।

शरद पूर्णिमा पर खीर खाने का विशेष महत्व है। प्राचीन काल से ही शरद पूर्णिमा को बेहद मह्त्वपूर्ण पर्व माना जाता है। जिसका हर किसी को इंतजार रहता है। पूर्णिमा से ही हेमंत ऋतु भी प्रारंभ होती है। यहां सामूहिक रुप में खीर का सेवन किया जाता है। संघ के प्रमुख पर्वो में यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन आसमान से होने वाली अमृत वर्षा का लाभ खीर व दूध रखकर लेने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस खीर या दूध का सेवन पूर्णिमा की आधी रात की जाती है। मान्यता यह भी है कि इस खीर के सेवन से लोग निरोग भी होते हैं। खीर देवताओं के भी प्रिय माना जाता है। यही कारण है कि संघ के द्वारा स्वस्थ्य लाभ के लिए इस परंपरा को अपनाया जाता है।

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