-सख्ती बढ़ने के बाद साइबर ठगों ने बदला ट्रेंड

-कारोबारियों को बना रहे हैं ग्राहक बनकर चूना

-शहर के कई कारोबारी हो चुके हैं ठगी के शिकार 01

रुपया पहले ग्राहक ने पेटीएम से भुगतान किया

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रुपये का भुगतान कर ठग ने ट्रांजेक्शन कंफर्म किया

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हजार रुपये के आर्डर ठग ने कारोबारी को दिया था मोहन झा, सिलीगुड़ी : कहते हैं न हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है। ऑनलाइन ठगी के पुराने तरीकों की भी एक्सपायरी डेट आ गई है। इसलिए साइबर ठग गिरोह अब अपना ट्रेंड बदल रहे हैं। ठगी का नया ट्रेंड व्यापारियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। बल्कि नए ट्रेंड से सिलीगुड़ी के व्यापारियों पर आक्रमण भी शुरु हो गया है। कई व्यापारी लाखों रुपए गंवा भी चुके हैं। लेकिन इन साइबर ठगों को उनके अंजाम तक पहुंचाना पुलिस के लिए और भी चुनौतीभरा हो गया है।

बैंक अधिकारी बनकर एटीएम व क्रेडिट कार्ड को अपडेट करने के लिए, यूपीआई एप पर बोनस आदि रिसीव करने, कर्ज दिलाने आदि के लिए फोन कर पासवर्ड और ओटीपी मांग कर खाते से रुपए उड़ाने का तरीका काफी पुराना हो चला है। सरकार, प्रशासन और बैंक प्रबंधन की जागरुकता अभियान रंग लाई है। अब इस तरह का कॉल आते ही लोग रद कर देते हैं। इसलिए साइबर ठगों ने नया ट्रेंड अपनाया है। नए ट्रेंड के एक से अधिक मामले सिलीगुड़ी मेट्रोपोलिटन पुलिस के साइबर क्राइम थाने में दर्ज हुए हैं। नए ट्रेंड में फंसाने के लिए ठग गिरोह मुख्य रुप से व्यापारियों को निशाना बना रहे हैं। पहले तो ठग गिरोह के सदस्य उत्पादक, सीएनएफ या डिस्ट्रीब्यूटर या थोक व्यापारियों के संबंध में सोशल मीडिया से जानकारी हासिल करते हैं। फिर उन्हें फोन कर संबंधित उत्पाद का एक ऑर्डर बुक कराते हैं। नए ट्रेंड में ठग खुद को भारतीय फौज का जवान या अधिकारी बताकर ऑर्डर निशाने पर लिए गए व्यापारी के निकटवर्ती सैनिक छावनी, सेट्रल या सैनिक स्कूल आदि पते पर मंगवाते हैं। डिलीवरी लेने के पहले फौज व उनके सख्त नियमों का हवाला देते हुए बैंक खाते में ऑनलाइन या यूपीआई एप व क्यूआर कोड के जरिए कीमत अदायगी का प्रस्ताव दिया जाता है। डिलीवरी के पहले भुगतान का प्रस्ताव आते ही व्यापारी को अनजाने पर भी भरोसा हो जाता है और फिर शुरु होता है ठगी का खेल। ऐसा ही एक मामला सिलीगुड़ी मेट्रोपोलिटन पुलिस के साइबर क्राइम थाने में दर्ज हुई है।

इस प्रकार से ठगी की घटना शहर के प्लाइवुड निर्माता एक व्यापारी के साथ घटी है। पहचान उजागर को अनिच्छुक व्यापारी ने बताया कि एक सप्ताह पहले उन्हें फोन आया। फोन करने वाले ने खुद को एक फौजी बताकर शहर से सटे सुकना स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल के एक बड़े पदाधिकारी के लिए प्लाइवुड का ऑर्डर दिया। ऑर्डर की कीमत 25 हजार रुपए से अधिक हुई। लेकिन फोन करने वाले ने कोई मोल-भाव नहीं किया। डिलीवरी की तिथी तय हुई। ऑर्डर फौज से जुड़ा होने की वजह से पिकअप वैन में सामान लादकर व्यापारी स्वयं डिलीवरी देने के लिए सुकना सैन्य छावनी पहुंचे। बताए स्थान पर पहुंचते ही व्यापारी ने फोन कर ऑर्डर देने वाले को जानकारी दी। फिर ऑर्डर देने वाले ने फौज के नियमों का हवाला देते हुए डिलीवरी लेने के पहले बिल का भुगतान करने की पेशकश की। व्यापारी मन ही मन खुश हुआ और राजी भी। उन्हें कहा गया कि भुगतान यूपीआई एप पेटीएम या कयूआर कोड द्वारा की जाएगी। जिसके लिए पहले उन्हें एक रुपया उनके पेटीएम पर भेजना होगा। व्यापारी के रुपया भेजते ही दूसरी तरफ से दो रुपया भेजकर कन्फर्म भी किया गया। इसके बाद व्यापारी से कहा गया कि फौज के ऑनलाइन भुगतान विधि के लिए बिल की रकम पहले उन्हें भेजनी होगी। उसके बाद दोनों रकम उन्हें वापस कर दिया जाएगा। इस पेंच को व्यापारी समझ नहीं पाए और भेजे गए क्यूआर कोड के जरिए उन्होंने 25 हजार से अधिक की रकम पेटीएम कर दिया। तब उनसे कहा गया कि उनकी तरफ से कुछ गड़बड़ी हो गई फिर से रकम भेजें। फौज पर विश्वास कर दोबारा रकम भेजी गई। तब कहा गया कि नेटवर्क की वजह से ट्रांजैक्शन फेल हो गया है, फिर से भेजिए। व्यापारी ने फिर से भेज दिया। इसी तरह उलझा कर फिर से रकम अदा करने को कहा गया। वह व्यापारी तो रकम ट्रांसफर करने ही वाले थे लेकिन एक दिन की पेटीएम लिमिट ने अलार्म बजा दिया। इसके बाद बैंक खाते से भी ऑनलाइन रुपया भेजने का प्रस्ताव दिया गया। बाद में रकम का आंकड़ा घटता गया, 25 से 20 फिर 15, 11 ताकि जो कुछ हासिल हो सके। अचानक दिमाग में खटकने पर व्यापारी ने रुपया भेजना बंद कर सामने मिलकर पेमेट लेने की बात की तो फोन काट दिया गया। इसके बाद लाख कोशिशों के बाद भी व्यापारी सामान की डिलीवरी नहीं कर पाए। वापस लौट कर व्यापारी ने पाया कि बार-बार किए पेटीएम ट्रांजैक्शन में करीब एक लाख रुपया भेज चुके हैं। जिसे बार-बार गड़बड़ बताया गया। इसके बाद उन्होंने साइबर क्राइम थाने में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई। हालांकि पुलिस सांत्वना के अलावा कोई पुख्ता भरोसा व्यापारी को उपलब्ध नहीं करा पाए।

ठगों का पता लगा पाना बेहद मुश्किल

पुलिस सूत्रों की माने तो इन साइबर ठगों को शिकंजे में लेना और सूखी घास में सूइ तलाश करने जैसा ही है। क्योंकि हर ठगी के बाद संबंधित बैंक खाता या यूपीआई अकाउंट बंद कर दिया जाता है। फोन नंबर बंद कर दिया जाता है। बल्कि इस तरह के फोन कॉल सिम बॉक्स और इंटरनेट के जरिए किए जाते हैं। जिसकी वजह से फोन व नंबर को ट्रैक करना लोहे के चने चबाने से भी मुश्किल है। क्येंकि सिम बॉक्स लोकेशन और आईपी एड्रेस को पल-पल बदलता रहता है। फिर भी पुलिस हर संभव कोशिश कर रही है। शहर व आस-पास के व्यापारियों को साइबर ठगों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए हम हमेशा तत्पर हैं। साइबर ठगी के मामलों को सुलझाने के लिए हर संभव प्रयास व कदम उठाए जा रहे हैं। बल्कि पुलिस जागरुकता अभियान चलाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। साइबर ठगों से सभी को सतर्क रहने की आवश्यकता है। -गौरव शर्मा,पुलिस कमिश्नर

Edited By: Jagran