आज ही के दिन धरती पर प्रकट हुई यमुना की धारा, पद्मपुराण में इन्हें कहा गया है पाप नाशिनी
चैत्र शुक्ल षष्ठी को यमुना जयंती मनाई जाती है, जब मां यमुना धरती पर प्रकट हुई थीं। पद्मपुराण में इन्हें पाप नाशिनी कहा गया है।

यमुनोत्री धाम।

समय कम है?
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अजय कुमार, उत्तरकाशी। गंगा (भागीरथी) के बाद यमुना देश की सबसे प्रमुख व पवित्र नदियों में से एक है, जिसे धार्मिक रूप से मां का दर्जा प्राप्त है।
प्रति वर्ष चैत्र शुल्क षष्टी तिथि को यमुना जयंती मनाई जाती है, इसे धरती पर यमुना के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
पद्मपुराण में यमुना नदी को पाप नाशिनी, शोक हारिणी व कल्याणी कहा गया है। मान्यता है कि भगवान सूर्य की पुत्री व यम की बहन यमुना नदी की जलधारा में जो भी व्यक्ति स्नान करता है, उसे पापों से मुक्ति मिल जाती है।
बता दें कि उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जनपद से ही देश की दो बड़ी व सदानीरा नदियां गंगा व यमुना का उद्गम होता है, जहां गंगा का उद्गम समुद्रतल से करीब 3892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गोमुख, गंगोत्री ग्लेशियर से होता है।
वहीं यमुना नदी का उद्गम समुद्रतल से 4421 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालिंदी पर्वत से होता है।
इस कारण इस नदी को कालिंदी नदी भी कहा जाता है। देश में उत्तरकाशी से उद्गम के बाद यमुना नदी प्रयागराज तक करीब 1376 किमी का सफर तय करती है।
जिसमें उत्तराखंड राज्य में यह करीब 170 किमी से अधिक के क्षेत्र में प्रवाहित होती है। प्रदेश में यह उत्तराखंड व हिमाचल के मध्य सीमा बनाते हुए बहती है।
यहां बेटी की तरह होता है मां यमुना की डोली का स्वागत
यमुनोत्री धाम के शीतकालीन प्रवास स्थल खरसाली में मां यमुना का शीतकालीन प्रवास व मंदिर है।
शीतकाल के लिए यमुनोत्री मंदिर के कपाट बंद होने के बाद मां यमुना की शीतकाल के छह मां पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना शीतकालीन प्रवास में ही होती है।
यहां मां यमुना को बेटी का दर्जा प्राप्त है। कपाटबंदी पर मां यमुना की उत्सव डोली का स्वागत भी मायके आने वाली बेटी की तरह ही होता है। वहीं, कपाट उद्घाटन पर विदाईगी भी बेटी की तरह होती है।
केवल नदी नहीं, जीवन का है आधार
गंगा की ही तरह यमुना केवल नदी नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यहां धरासू से यमुनोत्री के अंतिम पड़ाव जानकीचट्टी व डामटा से बड़कोट तक यमुनोत्री मार्ग में छोटे-बड़े होटल, ढाबे, रेस्तरां आदि यमुनोत्री यात्रा में तीर्थयात्रियों के आने से गुलजार हो जाते हैं।
कपाट बंदी के साथ इनमें सन्नाटा पसर जाता है। वहीं, कपाट उद्घाटन की तिथि नजदीक आते ही यहां यात्रा कारोबारियों में नया उत्साह व उमंग आ जाती है।
यमुनोत्री पैदल मार्ग पर घोड़े-खच्चर, डंडी-कंडी संचालकों को भी यमुनोत्री यात्रा से ही आजीविका प्राप्त होती है।
दीपदान के साथ निकाली जाती है कलश यात्रा
यमुना जयंती का दिन यमुनोत्री धाम सहित शीतकालीन प्रवास खरसाली के लिए विशेष होता है। इसी दिन आगामी चारधाम यात्रा के लिए पंचांग गणना से यमुनोत्री धाम के कपाट उद्घाटन की तिथि व समय की घोषणा की जाती है।
वहीं, मां यमुना के शीतकालीन प्रवास खरसाली स्थित यमुना मंदिर को सजाया जाता है। खरसाली के निकट यमुना नदी तट पर 1008 दीपदान के साथ लोक वाद्य यंत्रों के साथ कलश यात्रा व चुनरी मनोरथ का आयोजन होगा।
मां यमुना गोलोक वासिनी हैं। यमुना जयंती पर ही मां यमुना प्रकट हुई थीं। शास्त्रों में मान्यता है कि जो मां यमुना का पूजन, स्मरण व दर्शन करता है, उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
-प्रदीप उनियाल, कोषाध्यक्ष यमुनोत्री मंदिर समिति।
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