यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 14, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
गंगोत्री में मां गंगा की होती असली आराधना, गंगा की लहरों में घुलता 'गंगा लहरी' का संगीत
गंगोत्री में गंगा लहरी का सुमधुर संगीत जब भागीरथी गंगा की लहरों से एकाकार होता है तो श्रद्धालु और तीर्थ पुरोहित उसी भाव में डूब जाते हैं।

उत्तरकाशी, शैलेंद्र गोदियाल। गंगा धाम गंगोत्री में मां गंगा की असली आराधना रोजाना शाम की आरती से शुरू होती है। 'गंगा लहरी' का सुमधुर संगीत जब भागीरथी (गंगा) की लहरों से एकाकार होता है तो श्रद्धालु और तीर्थ पुरोहित उसी भाव में डूब जाते हैं, जिस भाव में डूबकर पंडित जगन्नाथ मिश्र ने काशी में दशाश्वमेध घाट पर 'गंगा लहरी' को रचा था।
गंगोत्री मंदिर समिति के सह सचिव एवं तीर्थ पुरोहित राजेश सेमवाल बताते हैं कि 'गंगा लहरी' मां गंगा का श्रेष्ठतम काव्य ग्रंथ है। इसीलिए गंगोत्री में हर दिन सांध्य आरती के बाद 'गंगा लहरी' का पाठ होता है। इस ग्रंथ में मां गंगा की महिमा और विविध गुणों का बखान किया गया है।
पंडित जगन्नाथ मिश्र द्वारा संस्कृत में रचित 'गंगा लहरी' में 52 श्लोक हैं। इनमें उन्होंने गंगा के विविध गुणों का बखान करते हुए मां गंगा से अपने उद्धार के लिए अनुनय किया है। 'गंगा लहरी' को 'पीयूष लहरी' भी कहते हैं।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार शाहजहां के शासनकाल में धार्मिक श्रेष्ठता को लेकर एक शास्त्रार्थ हुआ, जो कई दिनों तक चला। इसमें काशी से महापंडित एवं महाज्ञानी पंडित जगन्नाथ मिश्र भी पहुंचे। पंडितजी की विद्वता से बादशाह काफी प्रसन्न हुए और बोले, 'आप जो चाहे मांग सकते हैं, वही आपका पुरस्कार होगा।' इस पर पंडितजी बोले, 'जितने भी पंडितों को आपने बंदी बनाया है, उन्हें मुक्त कर दिया जाए।'
इस पर बादशाह ने उन्हें अपने लिए भी कुछ मांगने को कहा, तो पंडितजी ने एक मुस्लिम कन्या लवंगी का हाथ मांग लिया और उसके साथ काशी आ गए। काशी में ब्राह्मण इस बात से बहुत कुपित हुए और उन्होंने पंडितजी का बहिष्कार कर दिया। इस अपमान से पं.जगन्नाथ मिश्र बेहद दुखी हुए और इस दुख से छुटकारा पाने के लिए गंगा के श्रेष्ठतम काव्य 'गंगा लहरी' की रचना की। बावजूद इसके अपने और लवंगी के अपमान को वे फिर भी नहीं भूल पाए और सपत्नीक काशी के दशाश्वमेध घाट पर 'गंगा लहरी' गाने लगे।
गंगोत्री मंदिर के तीर्थ पुरोहित उमा रमण सेमवाल बताते हैं कि गंगाजी प्रसन्न होकर प्रत्येक श्लोक के पाठ के साथ एक-एक पग बढ़ने लगीं और 52 श्लोक पढ़ते-पढ़ते वह 52 पग बढ़कर उनके निकट पहुंच गईं। यह नजारा काशी के सारे पंडितों ने देखा और पंडितजी से क्षमा मांगने को विवश हो गए।