बंधुआ मजदूरी से मुक्त बच्चों को मिलेगा 5 से 7 लाख मुआवजा, पुनर्वास प्रक्रिया होगी सरल
मानव तस्करी और बाल श्रम से मुक्त बच्चों को न्याय, शिक्षा और रोजगार से जोड़ना आवश्यक है, जिसके तहत उन्हें ...और पढ़ें

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HighLights
मुक्त बच्चों को 5-7 लाख रुपये तक मुआवजा मिलेगा।
मुक्ति प्रमाणपत्र और पुनर्वास प्रक्रिया सरल की जाएगी।
शिक्षा, कौशल विकास से जोड़कर शोषण रोका जाएगा।
जागरण संवाददाता, रुद्रपुर/पंतनगर। मानव तस्करी और बाल श्रम से बच्चों को मुक्त कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें न्याय दिलाने के साथ शिक्षा, आर्थिक सहायता और रोजगार से जोड़ना भी जरूरी है। बंधुआ मजदूरी से मुक्त बच्चों को पात्रता के अनुसार पांच से सात लाख रुपये तक मुआवजा मिल सकता है।
हालांकि, मुक्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करने और पुनर्वास की प्रक्रिया में आने वाली बाधाएं पीड़ितों के सामने चुनौती बनी हुई हैं। राज्यस्तरीय मानव तस्करी रोकथाम सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि मुक्त कराए गए बच्चों की बकाया मजदूरी दिलाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके साथ ही एमसी मेहता मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत निर्धारित जुर्माने की राशि दिलाने का प्रयास भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि बंधुआ मजदूरी से मुक्त बच्चों को केंद्र सरकार की पुनर्वास योजना से जोड़कर आर्थिक सहायता और अन्य सुविधाएं दिलाई जानी चाहिए।
इसके लिए मुक्ति प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके आधार पर प्रशासन बच्चे के बंधुआ मजदूरी से मुक्त होने की पुष्टि करता है और उसके गृह राज्य में पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। हालांकि, प्रमाणपत्र प्राप्त करना आसान नहीं है। पिछले वर्ष संस्था की पैरवी के बाद 170 बच्चों को ही यह प्रमाणपत्र मिल सका।
मुआवजा और पुनर्वास की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, ताकि पीड़ित परिवारों को कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें। आर्थिक सहायता के साथ बच्चों की शिक्षा जारी रखना और उन्हें कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ना भी जरूरी है।
इससे उन्हें रोजगार के अवसर मिलेंगे और दोबारा शोषण या तस्करी के जाल में फंसने का खतरा कम होगा। सरकारी वित्त पोषण में कमी के कारण कौशल विकास कार्यक्रमों के संचालन में चुनौतियां आ रही हैं।
कई स्थानों पर प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए भी शुल्क देना पड़ रहा है। इस संबंध में मंत्रालय से बातचीत कर अवसर बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जस्ट राइट्स फार चिल्ड्रन ने पीड़ित बच्चों के कौशल विकास और पुनर्वास में सहयोग देने की पेशकश भी की।
मानव तस्करी के पांच रूप, जमीनी स्तर पर आपस में जुड़े
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने मानव तस्करी के पांच प्रमुख रूपों पर चर्चा की। इनमें व्यावसायिक यौन शोषण, शोषणकारी श्रम, शारीरिक शोषण, अंगों की खरीद-बिक्री या अंग निकालने और गुलामी अथवा दासता के लिए तस्करी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही इन रूपों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में एक ही पीड़ित को कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ सकता है।
प्यार और शादी का झांसा देकर भी तस्करी
मानव तस्करी के मामलों में विवाह और प्रेम संबंधों का झांसा भी दिया जाता है। इसमें आरोपित पहले आनलाइन या प्रत्यक्ष संपर्क कर विश्वास जीतते हैं। इसके बाद शादी का वादा कर पीड़ित को दूसरे स्थान पर ले जाते हैं और धीरे-धीरे परिवार से अलग कर शोषण या जबरन विवाह के लिए मजबूर करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएं, किशोरियां, संकटग्रस्त महिलाएं और रोजगार की तलाश में घर से बाहर जाने वाली महिलाएं ऐसे जाल के प्रति अधिक असुरक्षित हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने संबंधों में पहचान सत्यापन और भरोसेमंद लोगों को जानकारी देने की जरूरत पर जोर दिया।
स्पा और पर्यटन की आड़ में यौन शोषण
नौकरी, माडलिंग, स्पा, आतिथ्य और पर्यटन के नाम पर भी महिलाओं को शोषण के जाल में फंसाए जाने के मामले सामने आते हैं। इसमें पहले रोजगार या बेहतर अवसर का लालच दिया जाता है। इसके बाद पीड़ित को दूसरे स्थान पर ले जाकर कर्ज, धमकी और जबरदस्ती के जरिये उसकी आवाजाही पर नियंत्रण किया जाता है तथा यौन शोषण किया जाता है।
आपरेशन मुक्ति में 892 बच्चों का सत्यापन
गरीबी और असुरक्षा के कारण बच्चे बाल श्रम तथा तस्करी के जाल में फंस सकते हैं। घरेलू काम, कारखानों, कार्यशालाओं, ढाबों, होटलों और रेस्तरां में काम कराने के अलावा बच्चों से भीख मंगवाने, कचरा बीनने और उन्हें दूसरे शहरों में ले जाने जैसे मामले भी चिंता का विषय हैं।
बच्चों की खरीद-बिक्री और अवैध गोद लेने के मामलों में भी सतर्कता जरूरी है। उत्तराखंड पुलिस के आपरेशन मुक्ति के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में 892 बच्चों का सत्यापन किया गया।
इनमें से 378 बच्चों का विद्यालयों में नामांकन कराया गया, छह बाल श्रमिक बच्चों को मुक्त कराया गया और बाल श्रम के संबंध में दो अभियोग दर्ज किए गए। वर्ष 2017 से अभियान के तहत कुल 8,562 बच्चों का सत्यापन और 3,981 बच्चों का विद्यालयों में नामांकन कराया जा चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बाल श्रम के मामलों की समय पर पहचान, बच्चों को विद्यालय से जोड़ना और परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना तस्करी की रोकथाम के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
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