31 साल का हुआ उत्तराखंड का ये जिला, कहा जाता है 'चावल की नगरी'... विकास और चुनौतियों की कहानी
उत्तराखंड का यह जिला आज अपनी स्थापना के 31 साल पूरे कर रहा है, जिसने नैनीताल से अलग होकर तीन तहसीलों से आठ तहसीलों तक का सफर तय किया है।

रुद्रपुर सिडकुल का दृश्य। आर्काइव

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अनुज सक्सेना, रुद्रपुर। मैं ऊधम सिंह नगर हूं... आज 31 साल का हो गया हूं। 30 सितंबर 1995 को नैनीताल की गोद से अलग होकर मैंने अपनी पहचान बनाई थी। उस दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मुझे नया जिला बनाने की घोषणा की थी। नाम दिया ऊधम सिंह नगर...। तब मैं छोटा था... मेरे हिस्से में महज तीन तहसीलें थीं। मुझे चावल की नगरी भी कहा जाता है।
आज उम्र के 31वें पड़ाव पर पहुंचा तो मेरी तस्वीर ही बदल चुकी है। तीन तहसीलों से सफर शुरू हुआ और अब आठ तहसीलें मेरी पहचान हैं। जब मेरा जन्म हुआ था... तब रुद्रपुर, काशीपुर, बाजपुर, सितारगंज और खटीमा जैसे कस्बे आज की तरह औद्योगिक और शहरी विस्तार के लिए नहीं जाने जाते थे। सड़कों पर आज जैसी रफ्तार नहीं थी।
2002 में सिडकुल ने दी दस्तक
खेत मेरी सबसे बड़ी पहचान थे और गांवों की पगडंडियां मेरी तस्वीर का हिस्सा थीं। रोजगार के बड़े अवसरों के लिए मेरे यहां के लोगों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता था। लेकिन वक्त के साथ मैंने भी करवट ली। मेरे विकास की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब वर्ष 2002 में सिडकुल ने यहां दस्तक दी। उद्योग आए तो रोजगार के दरवाजे खुले।
देश-दुनिया की कंपनियों ने मेरी जमीन पर अपने ठिकाने बनाए। कल तक जिन खेतों और खाली जमीनों को लोग दूर तक देखते थे, वहां कारखानों की चिमनियां और औद्योगिक इकाइयां नजर आने लगीं। मेरी सड़कों ने भी रफ्तार पकड़ी। शहरों का विस्तार हुआ। नई कालोनियां बसीं। बाजार बढ़े और आबादी के साथ जरूरतें भी बढ़ती गईं।
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रिंग रोड, सड़क चौड़ीकरण जैसी परियोजनाओं ने शहरों के बीच कनेक्टिविटी को नई दिशा दी तो पंडित रामसुमेर शुक्ल राजकीय मेडिकल कालेज, किच्छा के निर्माणाधीन एम्स समेत कई हिस्सों में विकास का पहिया पहले से कहीं तेज घूमने लगा। तीन तहसीलों वाले मेरे बचपन से आठ तहसीलों वाले आज तक का सफर सिर्फ प्रशासनिक विस्तार की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें गांवों से निकलकर लोग उद्योगों तक पहुंचे, छोटे बाजार शहर बने और शहरों ने महानगरों की ओर कदम बढ़ाए।
लेकिन 31 साल की उम्र में मेरे सामने चुनौतियां भी कम नहीं
जिस रफ्तार से मेरी आबादी और शहर बढ़े, उसी रफ्तार से बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी बढ़ा। सड़कों पर बढ़ता यातायात, जलभराव, पेयजल, जल निकासी, कूड़ा निस्तारण, प्रदूषण, अतिक्रमण और तेजी से बसती कालोनियों को व्यवस्थित करना आज मेरी बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
मैंने विकास देखा है, लेकिन अब मेरी अगली परीक्षा संतुलित और टिकाऊ विकास की है। मेरी पहचान सिर्फ उद्योगों से नहीं है। मेरे खेत, मेरे किसान, यहां की नदियां-जलाशय, गांव और मेरी बहुरंगी सामाजिक संरचना भी मेरी असली ताकत हैं। तराई की मिट्टी में खेती और उद्योग दोनों साथ-साथ आगे बढ़े हैं।
वक्त के साथ बदलता दिख रहा मेरा चेहरा...
31 साल पहले मैं नैनीताल से अलग होकर अपनी पहचान बनाने निकला था। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि आने वाले वर्षों में मैं उत्तराखंड के प्रमुख औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में अपनी जगह बनाऊंगा। आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो तीन तहसीलों से आठ तहसीलों तक का सफर दिखाई देता है। खेतों के बीच से निकलती सड़कें दिखाई देती हैं। औद्योगिक इकाइयां दिखाई देती हैं। बदलते शहर दिखाई देते हैं। और सबसे ज्यादा दिखाई देता है... वक्त के साथ बदलता मेरा चेहरा।
अगले 31 साल की कहानी लिखी जानी अभी बाकी है
मैं ऊधम सिंह नगर हूं... 31 साल का हो गया हूं। बचपन पीछे छूट गया है। अब जवानी के इस पड़ाव पर मेरी जिम्मेदारियां भी बड़ी हैं। विकास की रफ्तार को बनाए रखते हुए अपनी जमीन, पानी, हवा और पहचान को बचाना है। क्योंकि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई...मेरे अगले 31 साल की कहानी अभी लिखी जानी बाकी है।
