संवाद सहयोगी, खटीमा: दीप पर्व दीपावली के नजदीक आने के साथ ही कुम्हारों की उम्मीद का चाक चल पड़ा है। दीप पर्व पर मिट्टी के दीयों से रोशनी करने की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसे में दीपावली के नजदीक आते ही कुम्हार दीये बनाने के काम में तेजी से जुट गए हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार उनकी दीवाली भी रोशन रहेगी।

दीप पर्व दीपावाली का त्योहार करीब आ गया है। पौराणिक मान्यता है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौटे तो नगरवासियों ने उनके स्वागत में घरों में दीप जलाए। तभी से दीपावली पर्व का आगाज हुआ। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। हालांकि आधुनिकता के इस दौर में दीयों का स्थान बिजली की झालरों ने ले लिया है। ऐसे में कुम्हारों के सामने आजीविका का संकट गहरा गया है। वर्ष भर इस त्यौहार की प्रतीक्षा करने वाले कुम्हारों की दीवाली अब पहले की तरह रोशन नहीं रही। हालांकि पिछले कुछ वर्षो से स्वदेशी निर्मित उत्पादों के प्रयोग को लेकर कई स्वयं सेवी संगठन खड़े हुए हैं। इसका असर भी दिखाई पड़ा है। इसी उम्मीद में कुम्हारों के चाक फिर से चल पड़े हैं। उन्हें उम्मीद है कि एक बार फिर से उनके अच्छे दिन लौटकर आएंगे। इसी उम्मीद में दीये तैयार करने का काम जोरों पर चल रहा है।

Posted By: Jagran

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