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उत्तराखंड में खोदाई के दौरान मिला गुप्तकालीन 'खजाना', खुले इतिहास के नए रहस्य

Published: Wed, 16 Sep 2026 09:17 AM (IST)Updated: Wed, 16 Sep 2026 09:22 AM (IST)

काशीपुर के गोविषाण टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खोदाई में ईंटों से बनी एक गोलाकार संरचना मिली है, जो गुप्त या कुषाण काल के कुएं जैसी प्रतीत होती है।

प्राचीन स्मारकों के सांस्कृतिक अनुक्रम व संरचनात्मक विरासत समझने में मिलेगी मदद। जागरण

प्राचीन स्मारकों के सांस्कृतिक अनुक्रम व संरचनात्मक विरासत समझने में मिलेगी मदद। जागरण

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गणेश पांडे, काशीपुर । ऊधम सिंह नगर जिले के काशीपुर स्थित ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व वाले गोविषाण टीले पर की जा रही खोदाई में ईंटों की बनी गोलाकार संरचना मिली है। जिससे क्षेत्र के पुरातात्विक इतिहास में रुचि पैदा हुई है।

कुएं जैसी प्रतीत होती संरचना के गुप्त या कुषाण काल के होने की संभावना है। खोदाई में आगे क्या निकलता है इसको लेकर हर कोई जिज्ञासु बना है और पुरातत्वविद भी उत्साहित हैं।

16 जुलाई को शुरू की खोदाई

गोविषाण टीले के नीचे दबे पुरातात्विक अवशेषों का पता लगाने, प्राचीन स्मारकों के सांस्कृतिक अनुक्रम व संरचनात्मक विरासत को समझने के उद्देश्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के महानिदेशक वाईएस रावत ने खोदाई के निर्देश दिए थे।

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एएसआइ के देहरादून मंडल ने कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत की मौजूदगी में 16 जुलाई को खोदाई शुरू की। शुरुआती उत्खनन में मिली ईंटों से निर्मित कुएं जैसी संरचना 10-11 फीट गहरी है। व्यास पांच-सात फीट के लगभग है। संरचना का आधा हिस्सा मिट्टी में दबे होने से अभी असल माप पता नहीं चली है।

एएसआइ देहरादून के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. एमसी जोशी का कहना है कि कुएं की संरचना का प्रारंभिक अवलोकन गुप्त काल के होने का संकेत देता है। यद्यपि आगे की खोदाई व विस्तृत अध्ययन के बाद ही यह स्पष्ट होगा।

डा. जोशी ने बताया कि गोविषाण टीले से प्राप्त सामग्री में अभी कोई विशिष्ट कलाकृति या शिलापट नहीं मिला है जो संरचनाओं को स्पष्ट रूप से किसी विशेष युग से जोड़े। निर्माण शैली, निर्माण में प्रयोग सामग्री, उत्खनित मिट्टी की परतों व भविष्य में खोजी जाने वाली कलाकृतियों सर्वेक्षण को दिशा देगी। मानसून में रोक दी गई खोदाई अक्टूबर में फिर से शुरू होगी।

पन्नी डालकर ढकी गई संरचना

बरसात की वजह से एक-डेढ़ माह से खोदाई बंद हैं। जलभराव, मिट्टी धंसने से संरचना को क्षति न हो इसके लिए उसे पन्नी से कवर करने के बाद मिट्टी से ढक दिया गया है। पुन: खोदाई शुरू होने पर मिट्टी व पन्नी हटाकर काम आगे बढ़ाया जाएगा।

90 एकड़ में फैला है संरक्षित क्षेत्र

गोविषाण टीले को द्रोण का किला भी कहा जाता है। संरक्षित किया यह स्थल 90 एकड़ में फैला है। आजादी के बाद कई बार हुई खोदाई में यहां छठी व सातवीं शताब्दी (गुप्त काल) की किलेनुमा दीवारें, तांबे के सिक्के, मूर्तियां व मिट्टी के बर्तन आदि मिले हैं।

1862-63 में भारत के तत्कालीन पुरातत्व सर्वेक्षक सर अलेक्जेंडरकनिंघम ने यहां का दौरा कर पुरातात्विक टीलों का पता लगाया था। 1963-64 में एएसआइ की खुदाई में गुप्त कालीन किले व प्राचीन संरचनाओं के अवशेष मिले थे।

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पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ

  • महाभारत काल में यह क्षेत्र उज्जैनी नगरी नाम से जाना जाता था।
  • छठी शताब्दी में यह कुनिंदा राजवंश का प्रमुख नगर था।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग (636 ईस्वी) के अनुसार, राजा हर्षवर्धन के शासनकाल में गोविषाण ढाई मील की परिधि में फैला था।
  • चारों ओर बगीचे, तालाब, मछली कुंड व बौद्ध मठ थे। ह्वेनसांग ने यहां 200 फीट ऊंचा भव्य अशोक स्तूप व दो अन्य स्तूपों का उल्लेख किया था।
  • यह स्थल गौरवशाली इतिहास के साथ सांस्कृतिक स्थल भी है।

अतीत को उजागर करने के लिए धैर्य जरूरी है। सटीक निष्कर्ष निकालने के लिए प्रारंभिक क्षेत्र अवलोकन व अटकलों के अलावा विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। एएसआइ के अधिकारी सावधानीपूर्वक आगे बढ़ रहे हैं।
-डा. एमसी जोशी, अधीक्षण पुरातत्वविद, एएसआइ, देहरादून