अर्जुन सिंह रावत, थल: बैसाखी पर्व के साथ ही आज जिले के ऐतिहासिक थल मेले का शुभारंभ होगा। इस मेले का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व तो है ही देश की आजादी की अलख जगाने में भी मेले का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

थल बालेश्वर शिव मंदिर के समीप बहने वाली रामगंगा नदी के तट पर लगने वाले थल मेले कभी उत्तर भारत का प्रसिद्ध व्यापारिक मेला भी था। उत्तर भारत के तमाम राज्यों से व्यापारी यहां पहुंचते थे। पूर्व में कैलास मानसरोवर यात्रा भी इसी मार्ग से होती थी। देश भर से आने वाले रामगंगा नदी में स्नान के बाद बालेश्वर मंदिर में दर्शनों के बाद कैलास यात्रा के लिए रवाना होते थे। धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के साथ ही मेले का एक पक्ष स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा है। जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी इसी मेले में जुटते थे और यहीं संघर्ष की रणनीति बनती थी। वर्ष 1940 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने मेले में जलियावाला बाग हत्याकांड का जबदस्त विरोध किया था। जिसे क्षेत्र के लोग आज भी याद करते हैं। मेले का व्यापारिक स्वरू प अब नहीं रहा। बाहरी व्यापारियों की आमद यहां लगभग खत्म हो गई है। स्थानीय व्यापारी भी बहुत कम ही पहुंचते हैं। मेले में कृषि उपकरण बनाने वाली कारीगर अपने उत्पाद लेकर आते हैं। ======== आज होगी मेले की शुरू आत थल: तीन दिवसीय थल मेले की शुरू आत शनिवार को होगी। मेला कमेटी की बैठक में आज आयोजन की तैयारियों को अंतिम रू प दिया गया। तीन दिवसीय मेल की शुरू आत स्थानीय स्कूलों के बच्चों की कलश यात्रा से होगी। तीन दिनों तक सायंकाल सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। मुख्य मेला 14 अप्रैल को होगा। बैठक में कमेटी के व्यवस्थापक दिनेश पाठक, सुरेंद्र पांगती, राम सिंह जंगपांगी, प्रवीण जंगपांगी, अर्जुन सिंह रावत, कृष्ण गोपाल पंत, सुनील सत्याल, नीरज जोशी, नानू वर्मा आदि मौजूद थे।

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