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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 07, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

यहां बनती थी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति, आज खंडहर में तब्दील

By Raksha PanthariEdited By:
Published: Tue, 07 Aug 2018 02:07 PM (IST)Updated: Wed, 08 Aug 2018 08:54 AM (IST)

जिस होटल में अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनार्इ जाती थी। वो आज खंडहर में तब्दील हो गर्इ है। देश की इस अमूल्य धरोहर की सुध लेने वाला कोर्इ नहीं है।

यहां बनती थी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति, आज खंडहर में तब्दील
यहां बनती थी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति, आज खंडहर में तब्दील

कोटद्वार, [अजय खंतवाल]: ब्रिटिश हुकूमत के दौर में हुए आजादी के तमाम आंदोलनों को गढ़वाल के कोने-कोने तक पहुंचाने में ऐतिहासिक नगरी दुगड्डा की अहम भूमिका रही है। तब आंदोलनों की रूपरेखा दुगड्डा में ही तय होती थी और इसका केंद्र हुआ करता था स्वतंत्रता सेनानी पं.धनीराम मिश्र का नगर में स्थित 'राष्ट्रीय होटल'। अफसोस कि आजादी के बाद किसी ने भी इस होटल की सुध लेना जरूरी नहीं समझा, जिससे राष्ट्र की यह अमूल्य धरोहर खंडहर में तब्दील हो चुकी है। 

पौड़ी जिले में कोटद्वार से 15 किमी की दूरी पर स्थित दुगड्डा नगर से ही राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आंदोलनों की मशाल गढ़वाल में प्रवेश करती थी। 'राष्ट्रीय होटल' में बैठकर आजादी के सिपाही इस मशाल को प्रज्ज्वलित करते थे। होटल में आने वालों को न सिर्फ मुफ्त भोजन परोसा जाता था, बल्कि उनके ठहरने की व्यवस्था भी की जाती थी। होटल में एक बड़ी मेज हुआ करती थी, जिसके दोनों ओर छोटे-छोटे स्टूल लगे रहते थे। इन्हीं स्टूलों पर बैठकर बुना जाता था आंदोलन का ताना-बाना। बावजूद इसके अंग्रेजों को 1942 तक इस बात का इल्म नहीं हो पाया कि होटल में उनके ताबूत पर कील ठोकी जा रही है। 

1920 तक आंदोलनों की रणनीति का केंद्र बन गया था होटल 

वर्ष 1905-06 में क्रांतिकारी धनीराम मिश्र ने दुगड्डा में यह होटल खोला था। शुरुआती दौर में होटल भले ही स्वतंत्रता सेनानियों की नजरों में न रहा हो, लेकिन वर्ष 1920 तक यह आंदोलनों की रणनीति का केंद्र बन चुका था। गांधीजी का सत्याग्रह, असहयोग व अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन रहा हो अथवा कोई अन्य आंदोलन, सभी की रणनीति यहीं बैठकर तय होती थी। स्वतंत्रता सेनानी पं. धनीराम मिश्र, उनके पुत्र कृपाराम मिश्र 'मनहर' व हरिराम मिश्र 'चंचल', रामप्रसाद नौटियाल, विष्णु सिंह रावत, छवाण सिंह, आदित्यराम दुदपुड़ी, मायाराम बड़थ्वाल, जगमोहन सिंह नेगी समेत आजादी के तमाम सिपाही यहां नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज कराते थे। 

आजादी से पूर्व ही ढल गया था सूरज 

राष्ट्रीय होटल से जुड़े रहे शिक्षाविद पीतांबर दत्त डेवरानी भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन अपने जीवनकाल में वे अक्सर इस होटल के बारे में चर्चा किया करते थे। वे बताते थे कि 'राष्ट्रीय होटल' 1942 तक स्वतंत्रता सेनानियों का प्रिय स्थान रहा। लेकिन इसी वर्ष 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान अंग्रेजों को इसके बारे में जानकारी मिल गई। तब अंग्रेजी अफसरों मिश्र समेत तमाम स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया। इसी के साथ ही इस होटल के भी दुर्दिन शुरू हो गए और वर्तमान में यह खंडहर बन चुका है। हालांकि, आजादी के बाद एक मर्तबा होटल को पुनर्जीवित कर राष्ट्र की इस अमूल्य धरोहर को बचाने का प्रयास किया गया। लेकिन, पर्याप्त जनसहयोग न मिलने के कारण योजना विफल हो गई। 

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