श्रीनगर गढ़वाल, [जेएनएन]: नौ साल बाद भी राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) का स्थायी परिसर अपने वजूद में नहीं आ पाया है। परिसर के लिए उपयुक्त जमीन न मिलना इसका कारण बताया जा रहा है। 2009 में श्रीनगर गढ़वाल में एनआइटी को स्वीकृति मिली थी। इसके लिए श्रीनगर के राजकीय पॉलीटेक्निक परिसर में एनआइटी के अस्थायी परिसर की व्यवस्था की गई। स्थायी परिसर न होने के कारण हर साल छात्रों की संख्या में वृद्धि होने से श्रीनगर के एनआइटी अस्थायी परिसर में भी समस्याएं बढ़ती चली गईं। जो छात्रों के असंतोष के रूप में सामने आया।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) के 900 छात्र-छात्राएं परिसर की व्यवस्थाओं से खफा होकर मंगलवार को संस्थान छोड़कर अपने घरों को चले गए। उन्होंने स्थायी कैंपस और पुख्ता सुरक्षा इंतजाम होने पर ही वापस लौटने की घोषणा की है। छात्र-छात्राओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और मानव संसाधन मंत्री के साथ ही उत्तराखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भी मेल, फैक्स व अन्य माध्यमों से अपने फैसले की सूचना दी है। एनआइटी प्रबंधन का कहना है कि मानव संसाधन मंत्रालय को प्रकरण से अवगत करा दिया गया है। 

दरअसल, 2013 में एनआइटी के स्थायी परिसर को लेकर श्रीनगर से लगभग 20 किमी दूर सुमाड़ी में जमीन उपलब्ध हुई। इसमें 50 प्रतिशत से अधिक जमीन क्षेत्र के ग्रामीणों ने दान में दी थी। इस जमीन पर साइट डिवेलपमेंट की लागत 188 करोड़ और कैंपस निर्माण को लेकर 350 करोड़ रुपये की केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से स्वीकृति मिली। जिस पर कार्यदायी संस्था एनबीसीसी ने बाउंड्रीवाल निर्माण के साथ ही कैंपस निर्माण को लेकर अपनी डीपीआर भी बनाई। 

एनबीसीसी की डीपीआर से साइट डिवेलपमेंट के लिए स्वीकृत 188 करोड़ की धनराशि को कम बताते हुए इसके लिए 900 करोड़ रुपये की जरूरत बताई। साथ ही बताया गया कि यह जमीन चार-पांच मीटर नीचे तक ढीली मिट्टी वाली भी है, जो निर्माण के लायक उचित नहीं है। इस पर वहां पर कार्य रुक गया। इसके बाद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रदेश सरकार से नई जमीन उपलब्ध कराने को कहा। 

इसके बाद बिल्वकेदार, जलेथा, खोला सहित अन्य जगहों पर भी एनआइटी के लिए जमीन की खोज शुरू हुई। अब 2018 में जलेथा के टॉप क्षेत्र में दत्ताखेत तक लगभग दो सौ एकड़ जमीन एनआइटी के लिए देखी गई। इसमें 111 एकड़ जमीन का प्रस्ताव स्वीकृति के लिए प्रदेश शासन को भेजा गया है। जब तक जमीन एनआइटी के नाम हस्तांतरित नहीं होगी, तब तक वहां पर निर्माण कार्य भी शुरू नहीं हो पाएगा। इस 111 एकड़ में भी लगभग केवल 50 एकड़ जमीन ही तुरंत मिल पाएगी। शेष जमीन वन भूमि है जिसके ट्रांसफर में समय लगेगा। 

पहाड़ में नहीं बन सकती तीन मंजिल से ऊपर बिल्डिंग 

एनआइटी प्रशासन का कहना है कि 50 एकड़ में कार्य नहीं चल पाएगा, क्योंकि पहाड़ में तीन मंजिल से ऊपर की बिल्डिंग भी नहीं बन सकती है। सुमाड़ी में एनआइटी के स्थायी परिसर के निर्माण को लेकर प्रगतिशील जन मंच ने श्रीनगर में लगभग तीन महीनों तक एक बड़ा जन आंदोलन भी चलाया गया। एनआइटी प्रशासन का मानना है कि एनआइटी परिसर के निर्माण के लिए कम से कम 150 एकड़ जमीन की जरूरत है। पता चला है कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जमीन शीघ्र उपलब्ध कराने को कहा है। 

मानक के अनुरूप नहीं है अस्थायी परिसर 

एनआइटी श्रीनगर गढ़वाल के छात्र-छात्राएं चार अक्टूबर से स्थायी परिसर का निर्माण कार्य शीघ्र शुरू करने और श्रीनगर के अस्थायी परिसर में मानक के अनुसार सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने पर परिसर को यहां से हटाने की मांग को लेकर आंदोलित हैं। 23 अक्टूबर को यह सभी आंदोलित लगभग 900 छात्र-छात्राएं अपने-अपने हॉस्टलों के कमरों को ताला मारकर   घरों को भी चले गए हैं। उनका कहना है कि मांग पूरी होने पर ही वह लौटेंगे। 

निचले पायदान पर है एनआइटी श्रीनगर 

इन्फ्रास्ट्रक्चर का भारी अभाव, लैब में सुविधाएं नहीं होने, प्लेसमेंट की समस्या, अध्ययन के लिए भी सुविधाएं नहीं होने के कारण ही एनआइटी श्रीनगर देश की कुल 31 एनआइटी में सबसे निचले पायदान पर है। काउंसिल ऑफ स्टूडेंट एक्टिविटी के उपाध्यक्ष विकास कुमार ने कहा कि नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग, फ्रेम वर्क की रैंकिंग में श्रीनगर की एनआइटी देश की सभी एनआइटी में सबसे निचले पायदान पर है। यहां मेडिकल सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं, फैकल्टियों की भी कमी बनी हुई है।

इन्हीं असुविधाओं के कारण यहां के छात्रों को कॉरपोरेट एक्सपोजर भी नहीं मिलता है। प्लेसमेंट के लिए यहां बड़ी इंडस्ट्रीज या कंपनी भी नहीं आती हैं। यहां के छात्र को तीन से पांच लाख का औसत पैकेज मिल रहा है, जबकि एनआइटी इलाहाबाद के छात्र का औसत पैकेज आठ से 12 लाख है। बीटेक इलेक्ट्रिकल के छात्र कमल किशोर का कहना है कि इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट बनाने को जरूरी छोटे-छोटे उपकरण भी यहां नहीं मिल पाते हैं। छात्रों को उन्हें बाहर से मंगाना पड़ता है। क्लासरूम में पर्याप्त जगह भी नहीं होती है। परिसर से बाहर बनाए हास्टलों में रहने वाले छात्रों की एकेडमिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी फर्क पड़ रहा है। 

सीटें कम होने का भी नुकसान 

एनआइटी श्रीनगर के बोर्ड आफ गवर्नर्स की जून 2018 में हुई बैठक में अस्थायी परिसर की समस्याओं के कारण हर ब्रांच में 50 प्रतिशत सीटों की कटौती भी कर दी गई। जो इस शैक्षणिक सत्र से लागू हो गई। छात्रों का कहना है कि सीटें कम होने से सबसे ज्यादा नुकसान उत्तराखंड के छात्रों का ही हुआ है। प्रवेश को लेकर उत्तराखंड के छात्रों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण है। एनआइटी श्रीनगर में सिविल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रानिक, मैकेनिक, कंप्यूटर साइंस पांच पाठ्यक्रम संचालित होते हैं, जिसमें अभी 866 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। एमटैक में 90 छात्र, पीएचडी में 24 छात्र अध्ययनरत हैं। 

प्री फैब्रिकेटेड बिल्डिंग बनाई

एनआइटी अस्थायी परिसर श्रीनगर में स्थानाभाव के कारण केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने पॉलीटेक्निक परिसर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर आइटीआइ के पुराने परिसर में लैब के लिए तीन प्री फैब्रिकेटेड बिल्डिंगों का निर्माण कराया। इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक, मैकेनिकल, सिविल, कम्प्यूटर साइंस के सभी लैब इन्हीं बिङ्क्षल्डग में हैं। जहां छात्रों को इन लैबों में भी जगह की कमी है। इसी कैंपस में एनआइटी का प्रशासकीय भवन भी है। 

लाइब्रेरी के ऊपर छात्राओं का हॉस्टल

एनआइटी श्रीनगर के अस्थायी परिसर में लाइब्रेरी के ऊपर ही छात्राओं का हॉस्टल भी बनाया गया है। जिसमें लगभग 90 छात्राएं रहती हैं। छात्राओं का कहना है कि इस हॉस्टल में पर्याप्त स्थान भी नहीं है और केवल एक ही प्रवेश द्वार है जो लाइब्रेरी का है। अस्थायी परिसर में छात्रों के अन्य हास्टल भी असुविधाओं से भरे हैं। एनआइटी श्रीनगर में उत्तराखंड के साथ ही हैदराबाद, विशाखापटनम, लद्दाक, राजस्थान के जैसलमेर, कोटा, हनुमानगढ़, गुजरात के सूरत, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम के छात्र-छात्राएं भी अध्ययनरत हैं। 

एनआइटी की काउंसिल आफ स्टूडेंट एक्टिविटी के  उपाध्यक्ष विकास कुमार ने बताया कि  चार अक्टूबर से काउंसिल लगातार केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय और प्रदेश सरकार को अस्थायी परिसर की समस्याओं के साथ ही आंदोलन के बारे में भी बता रही है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई इसीलिए छात्रों ने स्वेच्छा से घर जाने का निर्णय ले लिया। 

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