जागरण संवाददाता, कोटद्वार। तकरीबन 131 साल बीत गए कोटद्वार रेलवे स्टेशन को स्थापित हुए, लेकिन अब जाकर स्टेशन फिरंगी छवि से निजात पा पाया है। दो वर्ष पूर्व स्टेशन अंग्रेजों की ओर से बनाई गई 'डिबरी' व्यवस्था से आजाद हुआ और अब स्टेशन पर इलेक्ट्रिक इंजन दौड़ रहा है।

अंग्रेजी शासनकाल में वर्ष 1889-90 में स्थापित हुआ था कोटद्वार रेलवे स्टेशन। दौर बदल गया, लेकिन स्टेशन की व्यवस्थाएं दशकों पुरानी। कहने को वर्ष 2002-03 में इस स्टेशन को 'मॉडल' स्टेशन में तब्दील करने के लिए एक करोड़ की धनराशि की घोषणा हुई, लेकिन इस धनराशि में स्टेशन में लगाया गया सिर्फ एक 'अप्पू'। वर्ष 2010 में इस स्टेशन को 'आदर्श' स्टेशन के रूप में विकसित करने की बात कही गई, लेकिन स्थिति आज भी जस की तस। 'आदर्श' के नाम पर कुछ भवनों में रंग-रोगन हुआ और कुछ नवनिर्माण हुए, लेकिन न तो पटरियों की सुध ली गई और न ही यात्रियों की।

ऐसे होता था ट्रेन का संचालन

रेलवे के इस 'मॉडल-आदर्श' रेलवे स्टेशन में 2019 तक ट्रेन सिग्नल कैरोसिन (मिट्टी तेल) से जलने वाली 'डिबरी' से ही संचालित होते थे। कर्मचारी सिग्नल पोस्टों में बने बाक्स के भीतर डिबरी जला कर रख देते हैं। जब रेल रोकनी हो तो पटरी किनारे लगे लीवर को खींच कर लाल सिग्नल डिबरी के आगे कर दिया जाता है और जब रेल को चलाना हो तो लीवर छोड़ते ही सिग्नल हरा हो जाता था। उत्तर रेलवे ने स्टेशन की सुध ले ली और नजीबाबाद-कोटद्वार रेल ट्रैक को पूरी तरह विद्युतीकृत करते हुए अंग्रेजों के जमाने में लगे सिग्नलों को भी बदल कर उनके स्थान पर नए ऑटोमैटिक सिग्नल लगा दिए।

अब पहुंची इलेक्ट्रिक ट्रेन

कहना गलत नहीं होगा कि सिद्धबली बाबा का नाम कोटद्वार क्षेत्र के लिए अत्यंत फलदायक है। शायद यही कारण है कि सिद्धबाबा के नाम पर जब कोटद्वार से जनशताब्दी एक्सप्रेस का संचालन शुरू हुआ तो इसके कुछ दिनों के बाद ही कोटद्वार रेलवे स्टेशन को इलेक्ट्रिक रेल इंजन की सूरत देखने को मिली। 131 साल बीतने के बाद आखिरकार कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर इलेक्ट्रिक ट्रेन छुकछुक करते हुए पहुंची तो रेलवे स्टेशन ने फिरंगी छवि से पूरी तरह निजात पा ली। आज कोटद्वार रेलवे स्टेशन बदल रहे भारत की तस्वीर में शामिल हो गया है।

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Edited By: Raksha Panthri