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रामपुर तिराहा कांड: महिला आंदोलनकारियों से हुआ था दुष्कर्म, कइयों से बर्बरता... 32 साल बाद भी न्याय की आस

Published: Fri, 02 Oct 2026 11:21 AM (IST)

रामपुर तिराहा कांड के 32 साल बाद भी महिला आंदोलनकारियों पर हुए अत्याचार और हत्या के दोषियों को न्याय नहीं मिला है।

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किशोर जोशी, नैनीताल। दो अक्टूबर को पूरा देश महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाता है, लेकिन 32 साल पहले गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर अलग राज्य निर्माण के लिए दिल्ली कूच कर रहे आंदोलनकारियों के साथ मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में जो जुल्म व अत्याचार हुआ, उसके अधिकतर आरोपियों को अब तक सजा नहीं मिल सकी है।

हाई कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सीबीआइ की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर बताया गया कि इस मामले में तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह, एसपी राजेंद्र पाल सिंह, एएसपी महेश कुमार मिश्रा, सीओ गीता प्रसाद नैनवाल एवं जगदीश सिंह के विरुद्ध आरोप तय करने का कोई विधिक आधार नहीं है। ये आरोपी वर्ष 2005 में ही मुजफ्फरनगर कोर्ट से बरी हो गए थे। फिलहाल, आरोपियों को सजा दिलाने का मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है।

सात महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म

सरकारी रिकार्ड के अनुसार, 2 अक्टूबर 1994 को रामपुर तिराहा (मुजफ्फरनगर) में पृथक राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को पुलिस ने रोक दिया था। तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के निर्देश पर आंदोलनकारियों पर अत्याचार किए गए। पुलिस फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई। सात महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म हुआ तथा 17 अन्य महिला आंदोलनकारियों के साथ बर्बरता की गई।

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मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर सीबीआइ की ओर से जांच के बाद हत्या, घातक हथियारों के प्रयोग और फायरिंग से गंभीर चोट पहुंचाने जैसी धाराओं में केस दर्ज किए गए थे।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से उत्तराखंड हाई कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में बताया गया कि एक आरोपी राजबीर सिंह की मृत्यु के कारण उनके खिलाफ केस बंद कर दिया गया है जबकि सीबीआइ बनाम अनंत कुमार सिंह, सीबीआइ बनाम राजेंद्र सिंह, सीबीआइ बनाम बृजकिशोर-एसपी मिश्रा और सीबीआइ बनाम मोती सिंह आदि मामले अब भी विचाराधीन हैं।

सरकारी पत्र में आपराधिक षड्यंत्र का उल्लेख

उल्लेखनीय है कि 21 नवंबर को उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग का एक पत्र भी कोर्ट में दाखिल किया गया जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि 1 और 2 अक्टूबर 1994 की मध्यरात्रि मुजफ्फरनगर के तत्कालीन डीएम अनंत कुमार, एसपी राजेंद्र, मेरठ जोन के आइजी एसएम नसीम, डीआइजी बुआ सिंह, एएसपी महेश कुमार मिश्र, सीओ गीता प्रसाद, थानाध्यक्ष राधेमोहन द्विवेदी, राजबीर सिंह तथा निरीक्षक मोती सिंह आदि लोकसेवक तैनात थे।

इन लोकसेवकों ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को थाना छापड़ रुड़की रोड के रामपुर तिराहा पर रोका और उनके दिल्ली जाने के मार्ग में बाधा डाली।

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इस मामले में हाई कोर्ट के अधिवक्ता रमन कुमार शाह दशकों से हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक न्यायिक लड़ाई लड़ रहे हैं। हाई कोर्ट अब इस बिंदु पर सुनवाई कर रहा है कि तत्कालीन डीएम से संबंधित मामला देहरादून कोर्ट से मुजफ्फरनगर कोर्ट किस आधार पर और कैसे ट्रांसफर हुआ।