पिथौरागढ़, जेएनएन : सैनिक अपनी जीवटता के लिए जाने जाते हैं। विषम परिस्थितियों में देश की सरहदों की रक्षा करने वाले सैनिकों के दिल में हमेशा जोश और जज्बा रहता है। देश, समाज की तरक्की के लिए सेना से अवकाश के बाद भी कुछ लोग जुटे रहते हैं। ऐसे ही एक पूर्व सैनिक हैं सुरेश चंद्र नियोलिया। जो अपनी जवानी देश की सुरक्षा में लगा दिए और अब खेती से रोजगार के साधन सृजित कर रहे हैं। सुरेश चंद्र ने बताया कि छोटी मोटी नौकरी के लिए गांव से होने वाले पलायन को रोकने के लिए सोचा। छोटे स्तर से काम शुरू किया। मेहनत के बल पर सफलता मिली। आज ग्रामीणों को रोजगार दे पाने की क्षमता है। आने वाले दिनों में पूरे गांव को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास जारी है।

 

पलायन की पीड़ा से हुए विचलित, तो कुछ कर गुजरने की ठानी

अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिले की सीमा पर सरयू नदी किनारे स्थित न्यौलिया सेरा गांव के रहने वाले हैं सुरेश चंद्र नियोलिया। युवा होते ही सेना में भर्ती हो गए। देश की सीमाओं पर तैनात रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्त्ति के बाद अन्य लोगों की तरह हल्द्वानी, अल्मोड़ा या पिथौरागढ़ जाने की बजाय अपने पैतृक गांव में रहने का निर्णय लिया। गांंव में रहते हुए देखा की रोजगार के अभाव में गांव के लोग एक-एक कर गांव से पलायन कर रहे हैं। पूर्व सैनिक पलायन को देखते हुए आहत हुए। गांव में ही कुछ कर गुजरने का ख्याल आया। उन्होंने देखा की प्रतिदिन हल्द्वानी से साग, सब्जी के ट्रक आते हैं और ग्रामीण भी बाजारों से यही साग, सब्जी खरीदते हैं।

 

जैविक सब्‍जी की खेती कर बेरोजगारों को जोड़ा

पलायन के चलते खेत बंजर हो रहे थे। युवा ही नहीं बल्कि ग्रामीण छोटी मोटी नौकरी के लिए गांव छोड़ कर जा रहे हैं। दिल में विचार आया कि गांव में ही साग, सब्जी का उत्पादन कर ग्रामीणों को जागरू क किया जाए। उन्होंने अपने बंजर पड़े खेतों पर साग, सब्जी का उत्पादन प्रारंभ किया। जैविक साग, सब्जी को बाजार पहुंचाने लगे। परिणाम सुखद आते ही गांव के बेरोजगार ग्रामीणों को कार्य में लगाया। आज आठ ग्रामीण रोजगार पाए हैं। प्रतिमाह गांव में ही सात से आठ हजार रु पए कमा रहे हैं। सुरेश चंद्र नियोलिया का कहना है कि गांव के कम से कम पचास लोगोंं को रोजगार देना उनका लक्ष्य है।

 

जैविक ताजी सब्जी की रोज फोन से आती हैं मांग

सुरेश चंद्र नियोलिया के पास प्रतिदिन आसपास के क्षेत्रों से पचास किलो से अधिक साग, सब्जी की मांग आती है। लोगोंं की मांग पर ताजी सब्जियां उनके घरों तक पहुंचाई जाती है। जिसके चलते आमदनी बढ़ती जा रही है। मौसमी और बेमौसमी स्थानीय सभी साग, सब्जियां खेतों में तैयार रहती हैं। साग , सब्जी की सिंचाई , गुड़ाई , निराई और मांग पर सब्जी पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को रोजगार मिला है। रोजगार मिले रघुवर दत्त्त, खष्टीबल्लभ, पूरन चंद्र , दिनेश चंद्र बताते हैं कि सुरेश नियोलिया की पहल से उनकी सोच बदली । आज घर पर ही रोजगार मिला है।

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