नैनीताल, जागरण संवाददाता : लॉकडाउन में काम सिमटने की चिंता के बीच के छह जिगरी यारों ने अपनी व परिवार की पूंजी से न केवल कंपनी खड़ी कर दी, बल्कि दस लोगों को रोजगार भी दिया है। उनका कहना है कि पहाड़ में भी महानगरों की तरह सफलता का तानाबाना बुना जा सकता है। मल्लीताल निवासी रुचिर साह, गोविंद बिष्ट, सुरेंद्र बिष्ट, राहुल रौतेला, मयंक साह और विजय सिंह उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत की तरह है, जो मुश्किल हालात में हार मान जाते हैं। रुचिर साह ने बताया कि लाकडाउन के कारण उन्हें अपना रेस्टोरेंट बंद करना पड़ा, जबकि टीम में शामिल मयंक को कंपनी छोड़कर घर आना पड़ा। सुरेंद्र को भी दिल्ली से जाWब छोड़कर घर लौटना पड़ा। गोविंद का भी काम धीमा पड़ गया था।

इसी बीच सभी अगस्त में कैंची धाम पहुंचे और वहीं स्वरोजगार शुरू करने की कल्‍पना की। इसके बाद सभी ने हल्द्वानी में एडवरटाइजिंग एजेंसी खोल दी। रुचिर ने बताया कि एजेंसी शुरू करने के लिए रकम की जरूरत थी। इसके लिए सभी ने खुद की जमापूंजी के साथ ही परिवार से भी मदद ली। जो कमी पड़ी, उसे बैंक से ऋण लेकर पूरा किया गया, जिसके बाद एजेंसी में 50 लाख रुपये का निवेश किया गया। राहुल और गोविंद को इस फील्ड में पहले से ही अनुभव था, इसलिए ज्यादा परेशानी नहीं आई। रुचिर ने बताया कि सभी दोस्तों को कंपनी की मार्केटिंग से लेकर आर्डर समेत अन्य कामों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अभी छह दोस्तों के अलावा दस लोग यहां काम कर रहे हैं, जैसे-जैसे काम बढ़ेगा, पहाड़ के बेरोजगारों को और रोजगार दिया जाएगा। बहरहाल, इन दोस्तों ने महामारी को अवसर में बदलते हुए नया संदेश दिया है।

कोरोना काल में मनरेगा बनी प्रवासियों के लिए सहारा

नैनीताल में महामारी के दौर में 16 हजार से अधिक प्रवासियों को नौकरी छोड़कर अपने गांव आना पड़ा। प्रवासियों के आने से वीरान घरों के सालों बाद ताले खुले। लाकडाउन की अवधि में खासकर श्रमिकों की आर्थिक गाड़ी मनरेगा के दम पर ही आगे बढ़ी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिले में लॉकडाउन की अवधि में 16502 प्रवासी गांव लौटे। इसमें सर्वाधिक 3282 हल्द्वानी, 3204 रामनगर व सबसे कम 512 धारी ब्लाक के थे। इनमें विद्यार्थियों की संख्या 2218 थी, जबकि 546 प्रोफेशनल लोग थे। अब तक मनरेगा के तहत 687 प्रवासियों को रोजगार दिया जा चुका है, जबकि एक हजार से अधिक प्रवासियों को रोजगार देने की प्रक्रिया गतिमान है। एपीडी संगीता आर्य कहती हैं कि मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना से भी प्रवासियों को रोजगार दिया जा रहा है। 

मार्केटिंग छोड़ भुवनेश जिंदगी में घोल रहे चाय की मिठास

कहते हैं मन में कुछ कर गुजरने का जच्बा हो तो कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता हैं। भवाली के तिरछाखेत के भुवनेश गोस्वामी ने इसे अपनी जीवन का ध्येय बना लिया है। सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले भुवनेश पंजाब में मार्केटिंग का काम करते थे। लाकडाउन में वह बेरोजगारी हो गए और गांव लौटकर  तिरछाखेत रोड पर नैनीबैंड में एक छोटे से चाय के खोखे से स्वरोजगार शुरू किया। आज वह इसी दुकान से रोजाना करीब 500 रुपये की आय कर रहे हैं। उनका कहना है कि कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता। बेरोजगार बैठने के बजाय चाय की दुकान खोलकर खुद का व्यवसाय करना बेहतर है।

 

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