अल्मोड़ा, दीप सिंह बोरा : कुछ लोग शौकिया पौधे तो लगा लेते हैं मगर, फिर भूल जाते हैं। पर्यावरण प्रेमी प्रकाश जोशी ऐसे लोगों से बिल्कुल अलग हैं। वह उन बहुपयोगी पौधों व स्थल का चयन करते हैं, जो पहाड़ की आबोहवा के अनुकूल हों। साथ ही जलस्रोतों को नवजीवन देने वाले भी। इसी जज्बे से वह 20 साल में करीब दस हजार से ज्यादा पौधे लगा 10 से ज्यादा जलधारों को पुनर्जीवित कर चुके हैं। इनमें कुछ ऐसे प्राकृतिक नौले भी शामिल हैं जो सूख चुके थे। पर्यावरण, जैवविविधता व जलस्रोतों से लगाव ही है कि कुंजगढ़ नदी को बचाने के लिए दधीचि अवार्ड प्राप्त प्रकाश ने जोरदार पहल की तो वैज्ञानिक एवं शासन-प्रशासन भी उनके साथ खड़ा हुआ है।

जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि पंतनगर के छात्र रहे प्रकाश जोशी ने सरकारी नौकरी का मोह त्याग पहाड़ के प्राकृतिक स्रोत व पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में जो कदम बढ़ाए वह अब धरातल पर आकार लेने लगे हैं। जल ही जीवन है वाक्यसूत्र को हकीकत में बदलने का जज्बा ले जनवरी 2020 में उन्होंने दम तोड़ती कोसी की सहायक कुंज नदी के उद्धार का बीड़ा उठाया। उनके जुनून को देख कोसी पुनर्जनन महाअभियान के जनक प्रो. जीवन सिंह रावत अत्याधुनिक भौगोलिक सूचना विज्ञान (जीआइएस) के जरिये कुंज बचाने में सहयोग दे रहे हैं। वह जीआइएस मानचित्र के जरिये यांत्रिक उपचार में तकनीकी मदद भी देने में जुटे हैं। प्रकाश कहते हैं कि प्रकृति व पर्यावरण बचाकर ही हम तरक्की कर सकते हैं। उसी दिशा में लगातार प्रयास कर रहा हूं।

 

वर्ष 2017 में मिले दो अवार्ड

प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने व बहुपयोगी पौधे लगा नित नए प्रयोग के लिए पर्यावरण प्रेमी प्रकाश जोशी को वर्ष 2017 में पूर्व राज्यपाल डॉ. भीष्मनारायण सिंह ने दिल्ली में 'ज्वैल ऑफ इंडिया तथा उसी वर्ष राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक व पर्यावरणीय गतिविधियों से जुड़ी संस्था कॉरपोरेट रिस्पांसबिलिटी फंड की ओर से भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव ने दिल्ली में दधीचि सम्मान प्रदान किया।

 

नदी के बचाने को अनूठा प्रयास

प्रो. जीवन सिंह रावत, नेशनल जीयो स्पेशल चेयरप्रोफेसर (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) ने कहा कि प्रकाश जोशी की पहल सराहनीय है। उनके प्रस्ताव पर डीएम ने दिलचस्पी ली। यह पहला मौका है जब प्रशासन, तमाम विभाग और ग्रामीण मिलकर किसी नदी को बचाने के लिए एक साथ आगे आए हैं। दधीचि अवार्डी की इस मुहिम में भौगोलिक सूचना विज्ञान तकनीक से जो भी कार्य होंगे, पूरा सहयोग दिया जा रहा है। आने वाले एक डेढ़ दशक में सुखद परिणाम दिखने लगेंगे।

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