नैनीताल। हाई कोर्ट से कांग्रेस के बागी विधायकों को झटका लगा है। रावत सरकार को राहत देते हुए हाई कोर्ट ने बागी विधायकों की याचिका खारिज कर दी। सरकार की ओर से पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री व वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की।
रामनगर की विधायक अमृता रावत, जसपुर के शैलेंद्र मोहन सिंघल, केदारनाथ की शैलारानी रावत, रायपुर के उमेश शर्मा काऊ, नरेंद्र नगर के सुबोध उनियाल, रुद्रप्रयाग के हरक सिंह रावत, खानपुर के कुंवर प्रणव चैंपियन, रुड़की के प्रदीप बत्रा की ओर से दो याचिकाएं दायर कर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से दल-बदल कानून के अंतर्गत भेजे गए नोटिस को चुनौती दी गई थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने कोर्ट में दलील दी कि बागियों ने दल-बदल कानून का उल्लंघन नहीं किया है। यहां तक की सरकार के खिलाफ वोट भी नहीं दिया है। सरकार खुद कह रही है कि विनियोग विधेयक पारित हो चुका है। बागियों ने कांग्रेस का नहीं, बल्कि सरकार के भ्रष्टाचार का विरोध किया। पेपर कटिंग व मीडिया रिपोर्ट के आधार पर नोटिस दिया जाना गलत है।

सरकार की आलोचना करना अनुशासनात्मक श्रेणी में कैसे आ सकता है। कर्नाटक में 2011 में येदुरप्पा के खिलाफ भाजपा विधायकों के बगावत मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र भी किया। उत्तराखंड विधानसभा की नियमावली का उद्धरण देते हुए कहा कि सदस्य से परामर्श, इच्छानुसार और समुचित कार्रवाई का मौका देकर नोटिस दिया जाना चाहिए, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने जल्दबाजी में नोटिस जारी कर दिया। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय की भी गुजारिश की गई।


सरकार की ओर से वरिष्ठ कांग्र्रेस नेता व अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि बागी सदस्य कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहे हैं तो ऐसे में कांग्रेस पार्टी का विरोध नहीं करने की दलील न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने बागियों की ओर से दायर याचिका में भाजपा विधायकों के साथ राजभवन जाकर संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन को संलग्न नहीं करने पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।

सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद-226 के अंतर्गत स्पीकर को नोटिस भेजने का अधिकार होने का जिक्र किया। उन्होंने कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार के खिलाफ अविश्वास मत मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के महत्वपूर्ण तथ्य कोर्ट के समक्ष रखे। अधिवक्ता सिब्बल ने कहा कि स्पीकर ने अभी नोटिस दिया है, जो स्पीकर का संवैधानिक अधिकार है। हाई कोर्ट स्पीकर के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
दोनों पक्षों की दलीलों और तर्कों को सुनने के बाद न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट से बागियों की याचिका खारिज होने के बाद उनकी सदस्यता पर संकट गहरा गया है।

फैसले के अध्ययन के बाद अगला कदम
बागियों की ओर से हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में पैरवी को पहुंचे वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष विधायकों को 26 मार्च तक नोटिस का जवाब देना है। उन्होंने कहा कि एकल पीठ के फैसले का अध्ययन किया जाएगा, जिसके बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा, अलबत्ता इसके लिए समय बहुत कम है। उधर सूत्रों के अनुसार एकल पीठ के फैसले को खंडपीठ में चुनौती दी जा सकती है। कानूनी जानकारों के अनुसार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है।

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