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जंगल के लिए जरूरी और किसानों का मददगार उल्लू, उत्तराखंड में 15 से ज्यादा प्रजातियां... ये सबसे खास

Published: Sat, 24 Oct 2026 02:16 PM (IST)

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित ये पक्षी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, जिनकी सुरक्षा हेतु निगरानी बढ़ाई गई है।

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

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ललित मोहन बेलवाल, हल्द्वानी। रोशनी का त्योहार आते ही अंधविश्वास के चलते उल्लुओं के जीवन पर संकट के बादल छाने लगते हैं। तंत्र-मंत्र के फेर में फंसे लोग बलि के लिए उल्लुओं की तस्करी करवाते हैं। ऐसे में उन्हें महफूज रखने के लिए वन विभाग अलर्ट मोड पर आ जाता है।

इस वर्ष भी वन विभाग की ओर से सभी वन प्रभागों को उल्लुओं पर निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। चूंकि अंधविश्वास के अंधियारे को जागरूकता की लौ खत्म करती है इसलिए यह जानना जरूरी है कि उल्लु घर-परिवार नहीं बल्कि जंगल में समृद्धि लाता है।

शिकार, तस्करी पर पूरी तरह प्रतिबंध

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षित श्रेणी में आने वाले उल्लुओं के शिकार, तस्करी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। शहरीकरण, सड़कों के निर्माण के चलते जंगलों की कटाई के चलते पहले से ही उल्लुओं के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

इस पर शिकार और तस्करी इनके लिए अलग से खतरा पैदा कर रहे हैं। वन विभाग में बायोलाजिस्ट प्रशांत कुमार बताते हैं कि दीपावली आते ही पूरे प्रदेश में उल्लुओं की जान पर संकट आ जाता है। पिछले एक दशक में केदारनाथ, अगस्त्यमुनि समेत अन्य इलाकों में उल्लुओं की तस्करी के मामले सामने आए हैं।

खुफिया जानकारी के आधार पर वन विभाग भी निगरानी बढ़ा देता है। वह बताते हैं कि प्रदेश में उल्लुओं की गणना नहीं हुई है, लेकिन फील्ड के अनुभव बताते हैं कि उल्लुओं के आवास उजड़ रहे हैं।

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जंगल के लिए बेहद जरूरी हैं उल्लू

प्रशांत कुमार कहते हैं कि उल्लू जंगल की समृद्धि के लिए बेहद आवश्यक है। यह जंगल में चूहे, गिलहरियों की प्रजाति को नियंत्रित करते हैं।

खास तौर पर चूहों की आबादी अनियंत्रित होने से जंगल में बीमारियां बढ़ जाती हैं। चूंकि चूहे पेड़ों से गिरने वाले बीजों को खाते हैं, ऐसे में अगर किसी क्षेत्र में चूहों की संख्या अनियंत्रित हो जाए तो वहां पर पौधों के बीजों के जीवित बचने और नए पौधे बनने की संभावना घट सकती है।

दिन में आराम, रात को शिकार करते हैं उल्लू

वह बताते हैं कि उल्लू दिन में आराम और रात में शिकार करते हैं। खास बात यह है कि इनके पंखों से आवाज नहीं होती है। ये चूहे, छछूंदर के साथ-साथ कीट-पतंगों को भी खाते हैं। चूंकि खेतों के आसपास भी उल्लू विचरण करते हैं इसलिए वे फसलों को नुकसान पहुंचने वाले चूहे, कीट-पतंगें खाकर किसानों को फायदा पहुंचाते हैं।

दीपावली के दौरान ब्राउन फिश आउल सर्वाधिक संवेदनशील

उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में 15 से ज्यादा उल्लुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें दीपावली के समय सबसे ज्यादा संवेदनशील ब्राउन फिश आउल है। इसके अलावा बार्न आउल, इंडियन ईगल आउल, स्पाट बैलिड ईगल आउल, ब्राउन हाक, ब्राउन वुड आदि पाए जाते हैं। इनमें से स्पाटेड आउल आइयूसीएन की रेड लिस्ट में संकटासन्न श्रेणी में दर्ज है।

माता लक्ष्मी के वाहन को मारने से लगता है जीव हत्या का पाप

ज्योतिषाचार्य डा. नवीन जोशी ने बताया कि उल्लू की बलि का जिक्र किसी शास्त्र या ग्रंथ में नहीं किया गया है। यह माता लक्ष्मी का वाहन है और उन्हें बेहद प्रिय है। उसे बलि के नाम पर मारने से जीव हत्या का पाप लगता है न कि मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर समृद्धि देती है। अगर वाकई घर में सुख-समृद्धि चाहिए तो दीपावली पर श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र का पठा करें और जरूरतमंदों को दान करें।

उल्लुओं की निगरानी के लिए रात्रि गश्त बढ़ा दी गई है। चिह्नित जगहों पर विशेष नजर रखी जा रही है। अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूक करने के लिए आसपास के क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। - राहुल मिश्रा, डीएफओ, तराई पूर्वी डिवीजन

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