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नंदा देवी महोत्सव: नैनीताल में 124 साल पहले हुई शुरुआत... मजदूर के कंधे में सवार होकर होती थी विदाई

Published: Wed, 16 Sep 2026 01:25 PM (IST)

नैनीताल में 124 साल पहले शुरू हुआ नंदा देवी महोत्सव आस्था व श्रद्धा के रथ पर सवार होकर वैश्विक प्रसिद्धि तक पहुंच गया है।

नंदा देवी महोत्सव. File Photo

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संक्षेप में पढ़ें

किशोर जोशी, नैनीताल। सरोवर नगरी में 124 साल पहले नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत से अब तक का सफर आस्था व श्रद्धा के रथ पर सवार होकर वैश्विक स्तर के मंच की प्रसिद्धि तक पहुंच गया है।

70 के दशक तक शहर में मां नंदा सुनंदा के डोला भ्रमण के लिए नेपाली मजदूरों को लगाया जाता था, लेकिन समय के साथ आस्था व श्रद्धा का ऐसा ज्वार उमड़ा कि अब डोले को कंधा लगाना व छूना तक को श्रद्धालु खुद को धन्य समझते हैं।

हाई कोर्ट के आदेश पर एक दशक से अधिक समय से पशुबलि पर पाबंदी है तो दशकों पहले तक यह भैंसे की बलि दी जाती थी, अब पुलिस पहरे में बकरों की सिर्फ पूजा होती है तो श्रद्धालु पशुबलि के स्थान पर नारियल को फोड़ते हैं।

1903 में हुई थी शुरुआत

नंदा देवी महोत्सव की शहर में शुरुआत 1903 में हुई थी जबकि 1926 से महोत्सव श्रीराम सेवक सभा की ओर से आयोजित किया जा रहा है। श्रीराम सेवक सभा के पूर्व अध्यक्ष मुकेश जोशी मंटू बताते हैं कि 80 के दशक से पहले तक मां नंदा सुनंदा का डोला भ्रमण नेपाली मजदूरों के सहयोग से कराया जाता था।

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यहां तक कि आयोजक संस्था के लोगों की मौजूदगी में मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति निर्माण के लिए कदली वृक्ष तक नेपाली मजदूर ही लाते थे लेकिन 1980 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में दंगे हुए तो डीएसए मैदान में कुमाऊं यंग क्लब से जुड़े युवाओं ने मस्जिद के पास किसी तरह की स्थिति ना बिगड़े, इसलिए डोले में अपने कंधों में ले लिया और विसर्जन किया। जोशी बताते हैं कि कदली वृक्ष को को उत्साह व उमंग के साथ लाने की शुरुआत 1987-88 में हुई थी।

जोशी ने की पंचआरती की शुरुआत

नैनीताल: नंदा देवी महोत्सव में पंचआरती की शुरुआत भी 88-89 में शिक्षक व संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. भगवती प्रसाद जोशी ने की। जो आज भी जारी है। पूर्व पालिकाध्यक्ष जोशी के अनुसार वर्ष 1978 तक नंदा देवी महोत्सव में मां को चढ़ावे के रूप में भेंसे की बलि दी जाती थी।

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हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन के बाद 2011 से बकरों की बलि भी प्रतिबंधित हो गई। अब श्रद्धालुओं की ओर से मंदिर तक पुलिस पहरे में बकरों को लाया जाता है और पूजा अर्चना के बाद उनको वापस ले जाया जाता है। बलि पर पाबंधी के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु अब मंदिर परिसर में ही नारियल चढ़ाते हैं। जोशी बताते हैं कि मां नंदा सुनंदा के मूर्तिकारों में चंद्रलाल साह, नाथ लाल साह, ठाकुर दास साह, रमेश चौधरी, गंगा प्रसाद साह का योगदान उल्लेखनीय है।