हाई कोर्ट ने तलाक के निर्णय के विरुद्ध पत्नी की अपील को किया निरस्त, पति ने क्रूरता का आरोप लगाकर लिया था तलाक
नैनीताल हाई कोर्ट ने एक अधिवक्ता दंपति के तलाक के मामले में परिवार न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। ...और पढ़ें

HighLights
हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय के तलाक के आदेश को बरकरार रखा।
पति ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता का मामला साबित किया।
बेटी व पत्नी को कुल 1.1 करोड़ रुपये गुजारा भत्ता मिलेगा।
जागरण संवाददाता, नैनीताल। हाई कोर्ट ने चंडीगढ़ हाई कोर्ट में पत्नी व पूर्व अपर महाधिवक्ता तथा दिल्ली के एक लॉ फर्म में अधिवक्ता पति के बीच विवाह समाप्त करने के परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा है।
कोर्ट ने कहा कि पति ने मानसिक क्रूरता का मामला साबित किया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने पत्नी की ओर से पांच अप्रैल 2024 को परिवार न्यायालय देहरादून से पारित तलाक के निर्णय के विरुद्ध प्रथम अपील को निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने नाबालिग बेटी की देखभाल और शिक्षा के लिए 70 लाख रुपये तथा पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 40 लाख रुपये देने का निर्देश पति को दिया।
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि पेशेवर सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार किया गया अपमान जीवनसाथी की गरिमा और मानसिक स्थिति पर गंभीर असर डालता है, खासकर तब जब दोनों पक्ष स्वयं अधिवक्ता हों। अदालत ने माना कि यह आचरण साधारण वैवाहिक असहमति की सीमा पार कर मानसिक क्रूरता के दायरे में पहुंच गया।
अप्रैल 2016 से दोनोंं रह रहे थे अलग
दोनों का विवाह तीन मार्च 2014 को हुआ जबकि सितंबर 2015 में उनकी एक बेटी का जन्म हुआ। अप्रैल 2016 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं।
पति ने नवंबर 2016 में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की थी। परिवार न्यायालय ने 2024 में तलाक मंजूर कर लिया, जिसके बाद पत्नी ने हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।
दस साल से अलग रह रहे थे दोनों
हाई कोर्ट ने उन आरोपों पर गौर किया जिनमें कहा गया था कि पत्नी ने पति, उसके माता-पिता, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और वरिष्ठों के साथ अनुचित व्यवहार किया।
उस पर बार-बार कॉरपोरेट लॉ प्रैक्टिस छोड़कर चंडीगढ़ जाने का दबाव बनाया, चिकित्सीय जांच कराने की जिद की और पति तथा बच्ची को उसके माता-पिता से दूर करने की कोशिश की।
पति की ओर से स्वयं उसके अलावा उसके माता-पिता और एक अधिवक्ता गवाह के रूप में पेश हुए। न्यायालय ने नोट किया कि पत्नी ने केवल खुद को गवाह के रूप में पेश किया और अपने माता-पिता या किसी स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं किया।
कोर्ट ने नोट किया कि पक्षकार 2016 से मुकदमेबाजी में उलझे हुए हैं और 10 वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे हैं। परिवार न्यायालय, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुलह के कई प्रयास असफल रहे। तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए बेटी की अभिरक्षा पत्नी को सौंपी, जबकि पति के मुलाकात के अधिकार को भी मान्यता दी।
