प्रमोद पांडे, हल्द्वानी

¨हदी भाषा और साहित्य को आधुनिक रूप देने में अग्रणी भूमिका निभाने वाला उत्तराखंड का एक सितारा इसके इतिहास में तो ध्रुव के समान चमक रहा है, मगर नियति ने उसे अपनों के बीच धूमकेतु बनाकर रख दिया है। ¨हदी साहित्य के इतिहास में भाषाविद् डॉ. हेम चंद्र जोशी के नाम से चर्चित इस साहित्यकार का समग्र रचना-संसार व पांच हजार दुर्लभ पुस्तकों से संपन्न लाइब्रेरी नैनीताल में 1983 में हुए अग्निकांड में भष्म हो जाने के बाद इस संपदा को फिर से जुटाने के कोई प्रयास न कुमाऊं विश्वविद्यालय स्तर पर किए गए और न सरकारों ने ही इस दिशा में कोई रुचि दिखाई। परिणामस्वरूप दिवंगत होने के बाद यह व्यक्तित्व और उसका कृतित्व नई पीढ़ी के लिए अपरिचित हो गया।

21 जून 1894 को अल्मोड़ा के दन्या में पिता चंद्रबल्लभ जोशी के घर जन्मे इस भाषाविद् ने स्थानीय रैमजे इंटर कॉलेज से 12वीं तक की शिक्षा हासिल करने के बाद इलाहाबाद से बीए किया था। बाद में उच्च शिक्षा पूर्ण कर शोध संबंधी कार्य के लिए जर्मनी गए। छह साल तक वहां कई विदेशी व भारतीय भाषाओं का गहन अध्ययन किया। उन्हें 'यजुर्वेद में निहित राजनीति और अर्थशास्त्र' शोध ग्रंथ पर पेरिस की 'सारबोन' यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि से विभूषित किया। 'प्राकृत शब्दों का व्याकरण' के अलावा जर्मनी के चर्चित लेखक व चिंतक मैक्सीमूलर की रचनाओं का अनुवाद समेत कई अन्य भाषाओं में उत्कृष्ट पुस्तकों का अनुवाद भी उन्होंने किया। इनमें भाषा विज्ञान पर आधारित मैक्सीमूलर की पुस्तक 'लेक्चर ऑन द साइंस ऑफ लैंगुवेज' प्रमुख है।

यूरोप में उन्होंने जर्मनी, फ्रांस, इटली आदि देशों की यात्रा की। वहां से लौटने के बाद 'यूरोप जैसा मैंने देखा' संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी, जो अपने समय की चर्चित कृति रही। बाद में ¨हदुस्तान में उन्होंने कई विश्वविद्यालयों में न केवल पढ़ाया, भावी पीढ़ी में नई सोच भी विकसित की।

अपने जीवन के उत्तरा‌र्द्ध में वह ¨हदी के साथ कुमाऊंनी भाषा का ऐसा शब्द कोष बनाना चाहते थे, जिसमें शब्दों की व्युत्पत्ति के बारे में बताया जा सके। 15 अक्टूबर 1967 को दिवंगत होने से पहले नैनीताल डिग्री कॉलेज को पांच हजार दुर्लभ किताबें भेंट दीं, जो बाद में लाइब्रेरी में लगे भीषण अग्निकांड में भष्म हो गई।

विख्यात साहित्यकार व मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार इला चंद्र जोशी के बड़े भाई डॉ. हेम चंद्र जोशी काशी नागरी प्रचारिण्ी सभा के भी अध्यक्ष रहे। कलकत्ता में रहते हुए उन्होंने 'विश्वमित्र' समाचार पत्र का भी प्रकाशन किया था। साहित्यिक पत्रिका धर्मयुग का पहला संपादक बनने का गौरव भी उन्हीं के नाम है। अपनी दूरगामी सोच व विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने इस पत्रिका को बुलंदियों पर पहुंचा दिया था।

अगले साल उनका 125वां जयंती वर्ष शुरू होगा। इस अवधि में सरकार व विश्वविद्यालय उनके समग्र कार्य को यदि दोबारा एकत्रित कर ले तो यह उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि के साथ ही भावी पीढ़ी के लिए भी बेहद उपयोगी सिद्ध होगा।

Posted By: Jagran

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