संवाद सहयोगी, रामनगर (नैनीताल) : ब्रिटिश हुकूमत के समय 1906 मे लालकुआ से जब छोटी रेल लाइन बिछाई गई। और भाप वाले इंजन से सीटी बजाती रेल जब पहली बार रामनगर आयी तो वह लोगो के कौतूहल का विषय बनी रही। रेल देखने के लिए नगर के सारे लोग रेलवे स्टेशन की ओर दौड़ पड़े। कई समय तक रेल के आने जाने के समय लोगो की भीड़ रेलवे स्टेशन पर जमा हो जाया करती थी। यहां तक कि पहाड़ से भी लोग रेल देखने रामनगर पहुचे थे। लोगो मे आश्चर्य था कि लोहे की पतली सी लाइन पर रेल कैसे चलती होगी? उस समय तिजारती लकड़ी की रामनगर में बहुत अच्छी मंडी हुआ करती थी। यहां से मालगाड़ी के जरिये कीमती लकड़ी लालकुआ फिर बरेली भेजी जाने लगी। जिस समय रेल रामनगर आयी यानी 1906 में रामनगर की कुल आबादी 4038 थी। ज्यादातर काशीपुर से आने वाले व्यापारी ही यहां कारोबार किया करते थे। आजादी के बाद लकड़ी का कारोबार स्थानीय ठेकेदारों ने संभाला रेलवे स्टेशन के पास ही जंगलों से आने वाली लकड़ी पड़ी रहती थी। इस कारण इस स्थान का नाम रेलवे पड़ाव पड़ा। जिसे आज भी रेलवे पड़ाव कहा जाता है। उस दौरान यहां जंगलो में खैर के पेड़ बहुतायत में पाए जाते थे। जगलों में जगह-जगह कत्था बनाने के लिए झाले हुआ करते थे। साठ के दशक में कत्थे का कारोबार चरम पर था, जो रेल से मुरादाबाद, बरेली, दिल्ली, नेपाल, म्यांमार को सप्लाई होता था। उस दौर में कम आबादी होने के कारण लोग सकून से रहा करते थे। रेल की सीटी बजी नहीं की लोग समय का अंदाज भी इंजन की सिटी से लगा लिया करते थे।

kumbh-mela-2021

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप