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डाकू सुल्ताना के नाम पर पड़ा उत्तराखंड के इस गांव का नाम, जहां के लोग पंचायत चुनावों में नहीं डाल सकते वोट

Published: Thu, 01 Oct 2026 10:22 AM (IST)

गौलापार का सुल्ताननगरी गांव ब्रिटिश काल के डाकू सुल्ताना के नाम पर पड़ा है, जो 1920 के आसपास सक्रिय था।

250 परिवारों से जुड़े गांव का नाम पड़ गया सुल्ताननगरी।

250 परिवारों से जुड़े गांव का नाम पड़ गया सुल्ताननगरी।

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जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। गांव-कस्बों और शहर से जुड़ी कालोेनियों के नाम को लेकर अक्सर कोई न कोई वजह जरूर होती है। स्वतंत्रता सेनानी, महान विभूति से लेकर देवी-देवताओं के नाम से जुड़े इलाके भी मिल जाएंगे। लेकिन गौलापार में करीब 250 परिवारों से जुड़े एक गांव का नाम ब्रिटिश दौर के एक डाकू से जुड़ा है।

सुल्ताननगरी को यह पहचान देने वाला डाकू सुल्ताना था। बुजुर्गों से सुने गए किस्से गांव के पुराने लोगों को आज भी याद है। 1920 के आसपास सुल्ताना डाकू आसपास के जंगल से जुड़ी पहाड़ियों में छुप जाया करता था। ताकि पुलिस पकड़ न सके। 1924 में अंग्रेजों ने उसे पकड़ फांसी पर लटका दिया । 102 साल बीतने के बाद भी गांव के सरकारी स्कूल, शिलापट से लेकर ग्रामीणों से जुड़े अन्य रिकार्ड में भी सुल्ताननगरी ही दर्ज है।
 

तराई और हल्द्वानी तक थी खासी सक्रियता

1920 के आसपास सुल्ताना नाम के डाकू की नजीमाबाद से लेकर तराई और हल्द्वानी तक खासी सक्रियता थी। सुल्ताना के निशाने पर ज्यादातर वो बड़े जमीदार होते थे। जिनकी अंग्रेजों से नजदीकियां थी। किस्सों में उसे गरीबों का मददगार भी बताया जाता है।

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ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिए वह जंगल में छुपा करता था। ऐसा ही एक जंगल गौलापार में भी है। जिससे जुड़े गांव को सुल्तान नगरी कहा जाता है। स्थानीय बुजुर्ग नंदलाल और पूरन खत्री का कहना है कि बुजुर्गों के मुंह से उन्होंने सुल्ताना से जुड़े कई किस्से सुने थे।

गांव से सटे जंगल की पहाड़ी में गुफानुमा आशियाने में उसका ठिकाना हुआ करता था। समय बीतने के साथ ही सब कुछ ध्वस्त हो गया। अवशेष तक नहीं बचे। सुल्ताना के जन्म स्थल को लेकर ज्यादातर लोग मुरादाबाद का जिक्र करते हैं। जबकि कई नजीबाबाद से भी जोड़ते हैं।

विधायक-सांसद चुनने वाले प्रधान को नहीं दे सकते वोट

पूर्व बीडीसी मेंबर अर्जुन बिष्ट का कहना है कि सुल्ताननगरी के लोग लंबे समय से मालिकाना हक की मांग कर रहे हैं। लेकिन वनभूमि विवाद की वजह से अड़ंगा लगा हुआ है। ज्यादातर लोग कृषि और दूध कारोबार से जुड़े हैं।

गांव के लोग विधायक-सांसद के चुनाव में तो वोट डालते हैं। लेकिन प्रधान, बीडीसी मेंबर और जिला पंचायत को चुनने से वंचित है। सरकारी रिकार्ड में सुल्ताननगरी पंचायत का हिस्सा नहीं है। जिस वजह से लोगों के पास पंचायत प्रतिनिधि चुनने का अधिकार नहीं है।