भारतीय चिंतन में धर्म का संबंध नैतिकता और लोक मंगल से, दैनिक जागरण ने एमबीपीजी कालेज में किया विचार गोष्ठी का आयोजन
दैनिक जागरण ने एमबीपीजी कॉलेज, हल्द्वानी में विचार गोष्ठी का आयोजन किया, जहाँ वक्ताओं ने धर्म को कर्तव्य, सत्य और ...और पढ़ें
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जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। इतिहास, भूगोल और राजनीतिक सीमाओं से ही भारत को नहीं समझा जा सकता है। यदि भारत के बारे में जानना है तो सबसे पहले यहां की संस्कृति को समझना जरूरी है। लोक स्मृतियों, भाषाओं और जीवन दृष्टि को भी जानना महत्वपूर्ण है। यह विषय संपूर्ण भारत के दर्शन कराते हैं।
साथ ही हजारों वर्षों से मनुष्य को मनुष्य एवं मनुष्य को प्रकृति से जोड़े रखने की समृद्ध परंपर का पता चलता है। इनमें धर्म भी एक अनिवार्य विषय है और इसकी स्पष्टता भी जरूरी है। धर्म केवल पूजा-पद्धति से ही जुड़ा नहीं है, बल्कि भारतीय चिंतन में धर्म का संबंध कर्तव्य, सत्य, निष्ठा, करुणा, नैतिकता और लोक मंगल से भी है।
इसी से भारतीय संस्कृति की व्यापकता को समझा जा सकता है। दैनिक जागरण की ओर से सोमवार को एमबीपीजी कालेज में हिंदी विभाग के सहयोग से कराई गई विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने यह विचार प्रस्तुत किए। भारतीयता, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद केंद्रित विषय पर गोष्ठी हुई। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर हिंदी और भारत बोध विषय को भी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया।
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साहित्यकार एवं हिंदी की सहायक प्राध्यापक डा. रेनू जोशी ने संस्कृति को लेकर कहा कि यह केवल पर्व-त्योहार, वेशभूषा और खानपान का नाम नहीं है। बल्कि, यह हमें खुद की पहचान करना सिखाती है और जीवन की दृष्टि प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए सिर्फ महानगरों और बड़े संस्थानों की ओर नहीं देखना चाहिए, बल्कि असल भारत के दर्शन गांव में होते हैं। यहां के लोकगीत और लोक कथाओं संस्कार एवं परंपराओं को दर्शाया जाता है। साथ ही जनजीवन की सहज संवदना भी झलकता है। डा. जोशी ने उत्तराखंड को लेकर कहा कि यहां की लोक संस्कृति में प्रकृति और मनुष्य का अद्भुत संबंध है।
लोक उत्सवों में सामूहिक स्मृति और प्रकृति के साथ संबंध की कहानी छिपी हुई है। कहा कि लोक संस्कृतियां भारत बोध को जमीन देती हैं। जिसका अर्थ अपने अतीत को समझना, वर्तमान को पहचानना और भविष्य के प्रति जिम्मेदार बनना है। कार्यक्रम का संचालन डा. अमीता प्रकाश ने किया। यहां प्रो. जगदीश जोशी, प्राे. जयश्री भंडारी, डा. संध्या गढ़कोटी, डा. विक्रम राठौर आदि रहे।
10 अक्टूबर तक देशभर में जारी रहेगा विचार गोष्ठी का क्रम
दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेंद्र मोहन की जयंती पर दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में जागरण साहित्य सृजन सम्मान समारोह का आयोजन किया जाएगा। इसमें 11 लाख की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी। 10 अक्टूबर तक देश के विभिन्न शहरों में सामाजिक और राष्ट्र से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा।
भारत बहुरंगी सांस्कृतिक समन्वय का नाम: सुनील पाठक
अंतरराष्ट्रीय इतिहास एवं संस्कृति परिषद के अध्यक्ष सुनील पाठक ने कहा कि भारत ने सदियों से अनेक विचारों, भाषा, संस्कृति और परंपराओं को आत्मसात किया है। इसलिए भारतीय संस्कृति किसी एक रंगी संस्कृति का नाम नहीं है, बल्कि यह बहुरंगी सांस्कृतिक समन्वय है।
साथ ही हिंदी को लेकर कहा कि अहिंदी भाषी लोगों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया। यह हिंदी की शक्ति को दर्शाता है। वहीं, उन्होंने दैनिक जागरण के पूर्व संपादक स्व. नरेंद्र मोहन को लेकर कहा कि वह राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के पुरोधा थे।
उन्होंने उस समय दैनिक जागरण को राष्ट्रवाद के पक्ष में खड़ा किया जब सेकुलर राजनीति की प्रधानता थी। स्व. नरेंद्र मोहन के संपादकीय धर्म, दर्शन, संस्कृति पर विशेष रूप से होते थे। इसीलिए वो भारतीय संस्कृति के अधिक निकट पाए जाते थे।
अपनी भाषा के प्रयोग से ही प्रगति है संभव
वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. बीआर पंत ने कहा कि हिंदी काे हमने मातृभाषा माना लेकिन बन नहीं पाई। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा को साथ लेकर चलने वाले देशों ने ही प्रगति की। यह सत्य भी है कि जो अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे वही आगे बढ़ता है।
प्राे. पंत ने विद्यार्थियों को अपनी भाषा और बोलियों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। हिंदी की विभागाध्यक्ष प्रो. आशा हर्बाेला ने कहा कि हिंदी विचारों को जोड़ती है और दिलों को मिलाने का काम करती है। शोध एवं विकास समन्वयक डा. नरेंद्र सिजवाली ने छात्र-छात्राओं से अन्य भाषाओं का सम्मान करने के साथ ही अपनी भाषा-बोलियों पर गर्व करने को कहा।
