हल्द्वानी, जेएनएन : उत्तराखंड जैसी भौगोलिक परिस्थितियों वाले पर्वतीय राज्य मेघालय की तर्ज पर कुमाऊं के धारचूला व मुनस्यारी में मौनपालन (मधुमक्खी) किसानों की आय का जरिया बनेगा। कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड की पहल पर नोडल संस्था बनाई गई मंडी समिति हल्द्वानी ने इस दिशा में पहल की है। योजना के प्रथम चरण में किसानों को मौनपालन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। यहां प्रयोग सफल रहा तो सीमांत के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी किसानों को मौनपालन के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। आयुर्वेद में मधु को अमृत कहा गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश जैविक खेती होने के कारण इस क्षेत्र में मौनपालन से मिलने वाले शहद की देश-विदेश में अच्छी मांग है। विटामिन सी, विटामिन बी, सी, फॉलिक एसिड, साइट्रिक एसिड जैसे पदार्थों से भरपूर होने के कारण स्थानीय बाजारों में भी शहद की अच्छी मांग है।

भोजन के साथ ही इसका इस्तेमाल दवा और सौंदर्य प्रसाधन बनाने के लिए भी किया जाता है। इन सब गुणों के कारण मैदानी क्षेत्रों में रोजगार के तौर पर मौनपालन काफी समय से किया जा रहा है, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में मौनपालन के प्रति किसान जागरूक नहीं हैं।उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड की टनकपुर मंडी से संबद्ध पिथौरागढ़ जिले के धारचूला व मुनस्यारी में अब मंडी समिति हल्द्वानी ने यह पहल की है, जिसमें मेघालय की तर्ज पर किसानों को मौनपालन के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण मेघालय की जलवायु और पर्यावरण कुमाऊं के इन दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से काफी मैच करता है।

कम खर्च में स्थापित किया जा सकता है मौन वंश : मधुमक्खी पालन से परागण होने के कारण फसलों के उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है। प्रति मौन वंश स्थापित करने में लगभग तीन हजार रुपये खर्चा आता है। स्थापना के प्रथम वर्ष में तीन मौन वंश से दो अतिरिक्त मौन वंश तैयार हो जाते हैं, जिससे 20-25 किलोग्राम शहद का उत्पादन करके लगभग दो से ढाई हजार रुपये की आय होती है। एक बार लागत लगाने के बाद दूसरे वर्ष में महज तीन से चार सौ रुपये खर्च करके मधु उत्पादन से चार से पांच हजार रुपये आय होती है। 

मेघालय से बुलाए एक्सपर्ट : धारचूला और मुनस्यारी ब्लाक में 150 किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड ने मेघालय से ही मौनपालन के विशेषज्ञ की टीम बुलाई। कई दौर के प्रशिक्षण में पर्वतीय क्षेत्र के किसानों को मौनपालन की बारीकियां बताई गईं। आमतौर पर इन क्षेत्रों में लोगों को जंगल से शहद लाने का परंपरागत ज्ञान तो था, लेकिन मौनपालन का आधुनिक ज्ञान नहीं था। अब आधुनिक ज्ञान के जरिये किसानों को मौनपालन से जोड़ा जा रहा है, जिससे किसान स्वरोजगार से जुड़ सके। 

एक हजार किसानों को प्रशिक्षण देने का रखा लक्ष्य : कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड ने अगले एक साल में एक हजार किसानों को मौनपालन का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा है। प्रशिक्षण के साथ ही किसानों को मौनपालन के लिए बी-बॉक्स भी उपलक्ष्य कराए जाएंगे। इन्हें स्थानीय स्तर पर ही बनवाया जाएगा। सीमांत गांव में वर्षों से लोग मौन पालन का कार्य तो कर रहे हैं, लेकिन प्रशिक्षित न होने के कारण पारंपरिक तरीके से ही मौनपालन का कार्य करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। इसलिए प्रशिक्षण देने के लिए मेघालय से प्रशिक्षक बुलाए गए व विशेष प्रकार के बॉक्स भी मंगवाए गए। 

कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के एमडी धीराज गब्र्याल ने कहा कि अगर नैसर्गिक रूप से सुंदर सीमांत गांवों में कृषि, बागवानी के अतिरिक्त मौनपालन का कार्य किया जाए तो सीमांत गांवों में किसानों की आय जरूर बढ़ेगी। किसानों को वर्ष भर कार्य मिलेगा। मौन पालन की वजह से बागवानी के परिणाम भी उत्साहवर्धक होंगे।

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Posted By: Skand Shukla

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